तीखी कलम से

मंगलवार, 22 मार्च 2022

सितमगर पर कोई पहरा नहीं था

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मेरी   तहरीर    पर    पर्दा    नहीं   था ।

मगर   इंसाफ   का   चर्चा   नहीं   था ।।


बिके  हैं  क्या  यहाँ  मुंसिफ भी  यारो ।

सितमगर  पर  कोई   पहरा  नहीं  था ।।


लगे  हैं   दाग़  उसके   हुस्न  पर  क्यों ।

जमीं  पर  चाँद जब  उतरा  नहीं  था ।।


निभा  कर   वो  गया  है आज  कस्में ।

जो अपनी  बात  पर  ठहरा नहीं  था ।।


किया  तक़सीम  उनको  वक्त  ने  ही ।

जहां  सूरज  कभी   ढलता  नहीं  था ।।


सिसकता   अन्नदाता   कह   रहा   है ।

गिरोगे  तुम   कभी   सोचा  नहीं  था ।।


चमन   की  बोलियां  लगने  लगी   हैं ।

तुम्हारा   फ़ैसला  अच्छा   नहीं   था ।।


जलेगा   हर   नया  वो  शह्र  अब  तो ।

अभी  तक  शह्र जो  जलता नहीं था।।


महल का ख़्वाब दिखलाया गया क्यों ।

मेरी किस्मत में जब लिक्खा नहीं था ।।


रहे   दहशत   में  सारी   मीडिया   यूँ ।

ये   हिंदुस्तान  का  लहज़ा  नहीं  था ।।


मिले  थे  मुफ़्त  में  राशन जो हमको ।

वो हम पर कर्ज़ था तोहफ़ा नहीं था ।।


       - नवीन मणि त्रिपाठी

1 टिप्पणी:

  1. रहे दहशत में सारी मीडिया यूँ ।
    ये हिंदुस्तान का लहज़ा नहीं था ।।
    मिले थे मुफ़्त में राशन जो हमको ।
    वो हम पर कर्ज़ था तोहफ़ा नहीं था ।।
    बहुत खूब!आफरीन!! 👌👌👌🙏

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