तीखी कलम से

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

प्रेम दिवस के मुक्तक

बंदिश  से   निकल  आयी  बेबाक  मुहब्बत  है|
करने   लगी   है  सबको   आदाब  मुहब्बत  है ||
ठहरे  हुए  हैं  लम्हें   नजरों  का   कहर  बरपा |
बिखरी  सी  चांदनी  कि  महताब  मुहब्बत है ||



पहरे    हजार    होंगे  ,  परदे    हजार     होंगे |
हसरत   का   फूल   ले  के  वो  बेक़रार   होंगे ||
लहरें   तो साहिलों से लिपटेगी आज खुलकर |
हलचल   है   समंदर   में   बेख़ौफ़  ज्वार होंगे ||



कलियों   ने  गंध  छोड़ी   भौरे   मचल  पड़े हैं |
बरसात  कि  छुवन  से   दादुर  उछल  पड़े हैं ||
मौसम  है  आशिकाना  जज्बात  बह न जाए |
तुम  भी  वहीँ  खड़ी  हो  हम  भी यहीं  खड़े हैं ||


स्वाती  का   बूँद  लेकर   मैं   सीप   ढूँढता   हूँ |
बादल  के  लिए  धरती  की    चीख   ढूँढता  हूँ ||
संवेदना  के  स्वर  से  वाकिफ  हुई  वो जब से |
पायल   की   घुंघरुओं   में  संगीत   ढूँढता   हूँ ||


खुद  की कलम से खास  ,इश्तिहार  भेजता हूँ |
नदियों  को  समंदर  का  मैं  प्यार  भेजता  हूँ ||
इजहारे   मुहब्बत   का   झंडा   बुलंद   रखना |
होगा  मुकाम  हासिल    करार    भेजता    हूँ ||



 ये  शरबते  इश्क़   है  पीना बहुत  संभल  के |
तासीरे  आग  है  ये  कुर्बान  न  हो   जल के ||
जब जब शमा से यारी कर ली  है  पतंगों  ने |
खोया है पंख अक्सर आये थे जब निकल के ||

20 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 15/02/2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    कृपया पधारें ....धन्यवाद!

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    1. स्वाती का बूँद लेकर मैं सीप ढूँढता हूँ |
      बादल के लिए धरती की चीख ढूँढता हूँ ||
      संवेदना के स्वर से वाकिफ हुई वो जब से |
      पायल की घुंघरुओं में संगीत ढूँढता हूँ ||. waah bahut sundar muqtak , sabhi ek se badhkar ek anand aa gaya padhkar hardik badhai naveen jii

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  2. वाह वाह
    बहुत खूबसूरत मुक्तक वसंत पर
    हार्दिक शुभकामनायें

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  3. भाव और प्रस्तुति दोनों के रंग ने मन भा गए. बहुत अच्छी रचना त्रिपाठी जी.

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  4. सुन्दर भावों से सजी सभी मुक्तक बहुत सुन्दर है
    NEW POST बनो धरती का हमराज !

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  5. प्रेम दिवस पर लाजबाब मुक्तक ,बधाई त्रिपाठी जी..!

    RECENT POST -: पिता

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  6. सभी मुक्तक बहुत सुन्दर है !

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  7. स्वाती का बूँद लेकर मैं सीप ढूँढता हूँ |
    बादल के लिए धरती की चीख ढूँढता हूँ ||
    संवेदना के स्वर से वाकिफ हुई वो जब से |
    पायल की घुंघरुओं में संगीत ढूँढता हूँ ||
    - गहरी पुकार !
    -

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  8. नए अंदाज़ में प्रेम को लिखा है ... नए एर्थ दिए हैं प्रेमाभाव को ...
    लाजवाब ...

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  9. सुन्दर सार्थक संदेशपरक प्रस्तुति स्वार्थ तत्व पर कटाक्ष करती हुई /मरना है इश्क पर तो ,मरना संभल सम्भल के /जालिम है ये ज़माना चलना सम्भल संभलके

    प्रेम दिवस पर बेहतरीन गज़ल

    ये शरबते इश्क़ है पीना बहुत संभल के |
    तासीरे आग है ये कुर्बान न हो जल के ||
    जब जब शमा से यारी कर ली है पतंगों ने |
    खोया है पंख अक्सर आये थे जब निकल के ||

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