तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

गुरुवार, 26 मई 2016

चिट्ठियां तुझसे जलाई न गयी

बात दिल की भी छुपाई न गई ।
जुबां से कुछ भी बताई न गई ।।

तड़प तड़प के जिंदगी गुजरी ।
यह हकीकत भी मिटाई न गयी ।

शिनाख्त  इश्क  गजल  से  तेरे ।
चिट्ठियां  तुझसे  जलाई  न गई।।

नज़र नजर से मिल गई  होगी ।
इक  हसीं रात भुलाई  न गयी ।

दर्द  तेरा  बयां  है महफ़िल  में ।
बात  इतनी  सी बताई न गयी ।।

इश्क तहजीब  में  है  कैद  कहाँ ।
दरमियाँ सच के दिखाई न गयी ।।

       नवीन

बात हमसे छुपा नहीं सकते

‌दोस्ती  तुम   निभा  नही  सकते ।
आग दिल की बुझा नहीं सकते ।।

बेवफा  लोग   हैं  मेरी   किस्मत ।
दर्दे  मंजर   दिखा  नही  सकते ।।

‌ मेरी इज्जत उछाल कर तुम भी ।
 जश्न   कोई  मना  नहीं  सकते ।।

‌जख़्म  देकर  न  पूछ  दर्द  मेरा ।
आसुओं को मिटा  नहीं  सकते ।।

दिल  जलाने  की  साजिशें  तेरी ।
बात   हमसे  छुपा  नहीं  सकते ।।

‌दावतें  कब  कबूल  थीं  तुझको ।
यह  हकीकत  बता नहीं  सकते ।।

‌बना  रहे  ये   दोस्ती  का  भरम ।
तेरा   पर्दा  उठा   नही   सकते ।।

‌नफरतों  के  लिए तेरी  फितरत ।
तेरी  किस्मत  बना नही  सकते ।।

‌जहर  दिया  है गर  मुहब्बत  ने  ।
जिंदगी  हम  बचा  नहीं सकते ।।

रूठ  के  जा  मगर  ये याद  रहे ।
मुड़ के हम भी बुला नहीं सकते ।।

‌         नवीन

मंगलवार, 24 मई 2016

बुढ़ौती में बाबा रहैं दूरे दूरे (हास्य व्यंग अवधी और भोज पुरी मिश्रित भाषा)

हास्य व्यंग (अवधी और भोजपुरी मिश्रित)

बुढ़ौती   मा   बाबा   रहै   दूरे   दूरे ।
गदोरी   मा  सुर्ती  मलै   धीरे  धीरे ।।

लइका   से    अपने   मोबाइल    मंगावे ।
औ बूढा   का   फ़ोटू   इस्माइल  दिखावें ।।
ऊ  माडल   के  सबही  स्टाइल  दिखावें ।
विपासा  के  कपड़ा  सियाइल   देखावे ।।
मगन  होइ  के  बाबा  मोबाइल  चलावे ।
जवानी   में  खुद   का   ठगाइल  बतावें।।

लगल उनके चस्का है  डारे ऊ डोरे ।
मोबाइल  पे  चैटिंग  चलै  पूरे  पूरे ।।
बुढ़ौती   माँ   बाबा   रहै   दूरे   दूरे ।
गदोरी  मा  सुर्ती  मलै  धीरे   धीरे ।।

मजा फेसबुक  के जब  पा  गइले  बाबा ।
जवानी  के   फोटो   लगा   गइले   बाबा ।।
करें    रोज   यारी    बनै   रोज   रिस्ता ।
है लौटल जवानी  मा फिर  नवका  पत्ता ।।
खा  पी   के  नेट   मा   समाधी   लगावें ।
नया   वीडियो    ढूंढी  सबका    देखावें ।।

जवानी  के  रंगवा  चढ़ल  पोरे  पोरे ।
करै  करिया  जुल्फी  लगै गोरे  गोरे ।।
बुढ़ौती   मा   बाबा   रहैं    दूरे   दूरे ।
गदोरी   मा   सुर्ती  मलै   धीरे  धीरे ।।

नयी   आई   डी   ऊ    बनावले   फरजी ।
पतोहियन   के  जइसन बनावले भउजी ।।
अब कातिक  मा  फागुन  मनावेले  बाबा ।
अब  बुढ़िया  के  हरदम  भुलावेले बाबा ।।
बुढ़िया    बेचारी    कहे   दइया    दइया ।
भइल  बेकदर  जइसे  धाने  का  पाइया ।।

बाबा   नासाइल   दिखै   थोरे  थोरे ।
दसो  अंगुरी  घिव  मा  रहै बोरे बोरे ।।
बुढ़ौती   मा   बाबा   रहैं    दूरे   दूरे ।
गदोरी   मा   सुर्ती  मलै  धीरे   धीरे ।।

बाबा   के   देखी   के   बूढ़ा    परेशान ।
बुढ़ऊ के लागल  बा  का  कौनो शैतान।।
बुलावे   न   बोले    दिखावे    न   देखें ।
जबै देखो फोनवा मा टिक टिक दबोटें ।।
बुढ़ौती  माँ  इनहू  न  खा  जावें  गच्चा ।
करो कुछ जतन जे से हो जावे अच्छा ।।

चढ़ौली   कराही   नदी  तीरेे   तीरे ।
करै  विनती  बूढा  जपै  हारे  हारे ।।
बुढ़ौती   मा  बाबा   रहैं   दूरे   दूरे ।
गदोरी  मा  सुर्ती   मलै  धीरे  धीरे ।।

इक   दिन  मुकदमा   कै  तारीख  आइल ।
भवानी   कै  किरपा   घरा  मा  दिखाइल ।।
कचहरी  मा   जल्दी  चला  गइले   बाबा ।
बिछौना  मा  फोनवा  भुला  गइले  बाबा ।।
बजल फोन  घण्टी  तौ  बुढ़िया उठौलिस।
हेलो  डार्लिंग कहि  के  कौनो बोलौलिस।।

चकरा  कइके  बूढ़ा  बोलै जोरे  जोरे ।
कवन  नाश पीटी  तू  हौ  कौने ठौरे ।।
बुढ़ौती   मा   बाबा    रहैं    दूरे   दूरे ।
गदोरी   मा   सुर्ती   मलै  धीरे  धीरे ।।

तुरत  बूढा   बड़की   पतोहिया   बोलौली ।
उ  फोनवा   के   सारी   कहानी  सुनौली ।।
करे लागल जब फोन चक छोटका  नाती ।
खुले  लागल  बाबा  कै सब  पोल  पाटी ।।
ऊ बाबा  कै भेजल  लब   लेटर   दिखावै ।
भौजियन  का भेजल  ऊ  मैटर  दिखावे ।।

लगल  आगि मन मा  जरै भोरे  भोरे ।
करेजवा  मा  बतिया लगै  चीरे  चीरे ।
बुढ़ौती   मा   बाबा   रहैं    दूरे   दूरे ।
गदोरी  मा   सुर्ती   मलै  धीरे  धीरे ।।

पतोहिये    बतावे    गजब   भइले   बाबा ।
तो   नाती   कहे   सठिया   गइले   बाबा ।।
औ  घर  मा  बनल  है गरम  ई  के चरचा ।
लगै  जैसे   बूढ़ा  कै  सुलगल   बा  मरचा ।
सुनै  सारी   बतिया   कचा   गइली   बूढा ।
अंगनवा  मा फोनवा पटकि अइली बूढा ।।

ऊ  लोढ़वा  से  फोनवा  कुटै चूरे चूरे ।
गरम भइले  माथा  दिखै  घुइरे  घुइरे ।
बुढ़ौती   मा   बाबा    रहैं    दूरे   दूरे ।
गदोरी  मा   सुर्ती   मलै   धीरे   धीरे ।।

भइल  साँझ  बाबा लौटि  अइले  घर  का ।
न   बोलेली   बूढा   न   बोलेला   लइका ।।
बढ़ा   कोप  बूढा   लगौली   जो  झटका ।
तौ  बाबा  शरम  से  भये  हक्का  बक्का ।।
बड़ा  तू   तू  मै   मै  बड़ा   घम्मी   घम्मा ।
फटल  पूरा  कुरता   कहै   सब  निकम्मा ।।

गवाई  के  इज्जति  लगैं  कोरे  कोरे ।
दिखै बाबा घुटना औ सर फोरे  फोरे ।।
बुढ़ौती   मा   बाबा   रहैं    दूरे   दूरे ।
गदोरी  मा   सुर्ती   मलै   धीरे  धीरे ।।

        -नवीन मणि त्रिपाठी

शुक्रवार, 13 मई 2016

ग़ज़ल

मिजाज  ए इश्क़  को ये  चाँद जब दीदार  करता है ।
निगाहे   हुस्न   पर  परदा  कोई  सौ बार  करता है ।।

दुपट्टा  यूं  सरक  जाना  नही   था  इत्तफाकन यह ।
खबर कुछ तो मुकम्मल थी वो हमसे प्यार करता है।।

बरस जाने की ख्वाहिश अब्र  रखता  है तेरे दर  पे ।
ये बादल दिल से अक्सर गुफ्तगूं  दो चार करता है ।।

तू  आके  देख  महफ़िल  में  यहां तेरी  जरूरत  है ।
मेरे  महबूब  तुझ पर भी  कोई  ऐतबार  करता है ।।

तेरे  काजल  से शब्  तो  हो  गयी  बेइंतहा  काली ।
तुम्हारा   जुर्म  कब किस्सा  सही इकरार करता है ।।

लुटा  देने  की हसरत अब अदाओं पर तेरे  साकी ।
मैकदे  में  कोई  मयकस बहुत  इफ्तार  करता है ।।

तेरी पायल की घुंघरू से मिली जब आहटें उसको ।
हौसला  फिर  जवां  होकर  उसे  बीमार करता है ।।

हमारी  बेबसी  को   सिर्फ  मेरा  दिल  समझता  है ।
अजब चेहरा तेरा दिल  से  बहुत  तकरार करता है ।।

वस्ल की दास्ताँ तो सिर्फ दिल के  हर्फ़  में  लिक्खा ।
यकीनन  यह  नयी  चर्चा  नया  अखबार  करता है।।

किताबों की तरह  पढता  तुझे दिनरात  ऐ जालिम ।
परिंदा  सुर्ख  लब पर  क्यूँ बहुत  इजहार  करता है ।।

       नवीन मणि त्रिपाठी

रविवार, 1 मई 2016

गीत

" नवगीत "

हो गयी बिम्बित किसी अनुबन्ध की अभिव्यक्ति सी ।
वासना  की  ध्वनि   सदा  गुंजित  हुई  अतृप्ति  सी ।।

मेघ  अभिशापित धरा  को  देखता  है ।
क्यों कुमुदिनी पर भ्रमर की रिक्तता है ।
स्फुटित  स्वर  में  प्रणय  संलिप्तता है ।
मौन  पर   स्थिर   हुई   स्निग्धता  है ।।

फिर उपेक्षित सर्जना कुंठित लगी परित्यक्ति सी ।
वासना की ध्वनि  सदा गुंजित  हुई अतृप्ति सी ।।

कुछ विहग की रीति में भी द्वन्द होगा ।
चिर व्यथाओ में  छिपा आनंद  होगा ।।
कुछ क्षुधा का वेग किंचित मन्द होगा ?
वाटिका में क्या सुलभ मकरन्द होगा ?

हिमखण्ड से निकली नदी बहने लगी अनुरक्ति सी।
वासना  की  ध्वनि  सदा  गुंजित  हुई  अतृप्ति सी ।।

बाँसुरी   की  प्रीति  अधरों  से  सदा  है ।
राग  का  स्वर  किन्तु  प्रहरों से बंधा है ।।
सेतु  का  विस्तार  लहरों  से  सजा  है ।
ज्वार का उन्माद कब किसको पता है ।।

रक्तिम आभा को लिए तुम नेह की निष्पत्ति सी ।
वासना  की  ध्वनि सदा गुंजित हुई अतृप्ति सी ।।

व्योम  में अनुनाद  की आवृत्ति  जीवित ।
कण्ठ  से  अनुराग  के  है गीत मण्डित ।।
हो  रही  कोई  बसन्ती  गन्ध  मुखरित ।
हाँ किसी मधुमास का यौवन सुशोभित ।।

अब घटा समदृश्य अलकें हो गयीं आसक्ति सी ।
वासना की ध्वनि सदा  गुंजित  हुई अतृप्ति सी।।

उर के अंतर  में  लिखी तुम  कामना हो ।
सिद्ध  जीवन  मन्त्र की तुम साधना हो ।।
छंद  की  कल्पित  समर्पित  भावना  हो ।
तुम निशा  की  जीत की  प्रस्तावना  हो ।।

है दृष्टि से तेरी छुवन अब पीर की उन्मुक्ति सी ।
वासना की ध्वनि सदा गुंजित हुई अतृप्ति सी ।।

                         -- नवीन मणि त्रिपाठी

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

मचलता है वहीँ भौरा

वो अपनी बदगुमानी पर  हुई मगरूर  ज्यादा  है ।
अजब  दस्तूर है या रब  वही  मशहूर  ज्यादा है ।।

वो नज़रें फेर लेती है गली से जब कभी निकला ।
मुहब्बत  का  नशा  होने लगा  काफूर ज्यादा है ।।

मचलता  है कोई  भौरा  कली  की  बेशुमारी  पर ।
नज़र करती  वहीँ सजदा  जहाँ पर नूर ज्यादा है ।।

तुम्हारे  हुश्न  की  चर्चा  शहर  की हर  गली  में है ।
जमाने  ने  कहा   तुझको  चश्मेबद्दूर   ज्यादा   है।।

मरीज  ए  इश्क  हूँ  जिन्दा  रहूँगा  ये  खुदा  जाने ।
हकीमों   ने   बयानों   में   कहा  नासूर  ज्यादा  है ।।

तेरे  खत  में  हिदायत  थी कभी न  बात करने की ।
रहम करना  ख़ता पर दिल हुआ मजबूर ज्यादा है ।।

                      --नवीन मणि त्रिपाठ

इश्क में क्यूँ जुबाँ बेअदब हो गयी

यह कहानी भी तेरी  गजब  हो  गयी ।
इश्क में क्यूँ जुबां  बे अदब  हो गयी ।।

एक  माशूक  जलता  रहा  रात  दिन ।
गैर दर  पे  मुहब्बत  तलब  हो गयी ।।

दस्तकों  से  मेरा  ताल्लुक  था  बहुत ।
ख्वाहिशें   बेवजह  बेसबब  हो  गयीं ।।

चाँद   अंगड़ाइयां   ले   गुजरता  रहा ।
वक्त ही  न  रहा  खत्म  शब् हो गयी।।

सुर्ख  लब पे  पढे  चन्द  अशआर  थे ।
वह ग़ज़ल भी जवां जाने कब हो गयी।।

सख्त  पहरा था  दरबान  का हुश्न  पर ।
दिल की दीवार में क्यूँ नकब  हो गयी ।।

                    --नवीन मणि त्रिपाठी