तीखी कलम से

मेरे बारे में

मेरा फोटो
जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

वैचारिक प्रदूषण

हर ओर बलात्कार
नृशंस हत्याव्ओ से हाहाकार
गुंजित दिशाएं 
नारियो की चीख से।
फिर भी हम नही जाग पाए 
गहरी नीद से 
क्या हो गया भारतीय समाज को ?
कौन मिटा रहा 
इसके गौरव पूर्ण इतिहास को ?
चीर हरण में युधिष्ठिर की भांति
अखबारों की सुर्खियों पर
हम मौन हैं ।
हम इतना भी नहीं सोच पाते
सभ्यता संस्कृति के 
लुटेरे कौन हैं।
पाश्चात्य सभ्यता .....अँधानुकरण ।
युवाओं की जेब में 
ब्लू फिल्मो का संवरण
उत्तेजित करने वाले 
वस्त्रो का आवरण
महत्वाकांक्षाओं का भरण 
नैतिकता का क्षरण
रोज लुट रहा समाज का आभूषण
एक खतरनाक वायरस की तरह
फ़ैल रहा 
वैचारिक प्रदूषण।
हार गये तुम ?
उठो और देश बचाओ।
इस से पहले निगल जाये 
तुम्हारी स्मिता को ।
बची खुची सभ्यता को ।
अपनी खोई सभ्यता अपनाओ।
वैचारिक प्रदूषण भगाओ ।
वाचारिक प्रदूषण भगाओ।।

        -नवीन मणि त्रिपाठी

रविवार, 17 अगस्त 2014

प्रणय के नाम



तुम्हारी झील सी आँखों  में, अक्सर खो चुके हैं हम ।
प्यास जब भी हुई व्यकुल तो बादल बन चुके हैं हम।।
ये अफसानों  की है दुनिया, मुहब्बत  की कहानी है ।
सयानी  हो  चुकी  हो  तुम ,सयाने हो  चुके  हैं  हम ।।


कदम फिसले नहीं जिसके वो रसपानो को क्या जाने।
मुहब्बत की नहीं जिसने ,वो बलिदानों को क्या जाने ।।
ये  दरिया  आग  का  है , ईश्क में जलकर जरा देखो ।
समा  देखी  नहीं  जिसने, वो परवानो  को क्या जाने ।।


तेरे  जज्बात  के  खत  को , अभी  देकर गया  कोई ।
दफ़न    थीं   चाहतें  ,उनको   भी  बेघर  गया  कोई ।।
हरे  जख्मों के  मंजर  की , फकत इतनी निशानी है ।
हमें   लेकर   गयी   कोई,  तुम्हे   ले कर गया   कोई ।।


मिलन  की  आस को लेकर, वियोगी  बन  गया था मै।
ज़माने  भर  के लोगों का , विरोधी  बन  गया  था मै ।।
रकीबो  के  शहर   में  ,जुल्म   के  ताने   मिले  इतने ।
बद चलन बन गयी थी तुम , तो भोगी  बन गया था मै।।


                  -नवीन मणि त्रिपाठी
(सारे तथ्य काल्पनिक हैं
मुक्तक में मेरे अथवा किसी
अन्य के जीवन से कोई
 सरोकार नहीं है ।)

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

इन शहीदों का मुकम्मल सलाम बाकी है

इन  शहीदों  का , मुकम्मल  सलाम  बाकी  है ।
मुल्क  के  पन्नों  में ,अहले  मुकाम  बाकी  है ।।

जिसने फंदों से मुहब्बत की मौत  की खातिर ।
उनकी जज्बात पे,  लिक्खा कलाम  बाकी है ।।

चिता  शहीद  पे  मेलों   का  जिक्र  कौन  करे ।
अब  तो  चादर  भी, कब्र पर तमाम  बाकी है ।।

हुए   हलाल   तो  दीवाने  ए  हिन्द  खूब  यहाँ ।
तमाशबीन ,  वतन    का    हराम    बाकी   है ।।

मजहबी   साजिशें    रचने   लगे   सियासतदा ।
सहादतों   का   ये , कैसा    ईनाम   बाकी   है ।।

जश्ने  आजादी   गुलामी  को   मिटाने पे  मिली।
मुफलिसी  दौर  में , जीता    गुलाम   बाकी  है।।

कौम  से   कौम  लड़ाते  वो  आज मकसद  से।
अमन   शुकूँ   का ,यहाँ  पर  पयाम  बाकी  है ।।


                  -नवीन मणि त्रिपाठी

रविवार, 10 अगस्त 2014

कानपुर का साहित्य साम्राज्य





                                                                 _                                         -नवीन मणि त्रिपाठी


कानपुर शहर का ठेठ फक्कड़ी अंदाज "वाह गुरु " और "झाडे रहो कलट्टर गंज "इस तरह के अनेक चर्चित वाक्य हर गली चौराहे पर अपना रस बिखेर ही देते हैं । औद्योगिक जीवन शैली ,घनी आबादी, मशीनों ,चिमनियों के कचरे और कीचड में रचा बसा शहर अपनी पहचान आज भी सजोये हुए है । कहा जाता है कमल कीचड़ में खिलते हैं । यह सच भी है । आजादी की जंग हो या वैचारिक क्रांति के लिए साहित्यकारों की भूमिका , इस शहर ने अनेको कमल खिलाये हैं ।
        कानपुर साहित्यकारों की धरती रही है। यहाँ की उन्मुक्त लेखन शैली देश को जागरूक करने में अपनी महती भूमिका के लिए अति महत्त्वपूर्ण पहचान रखती है । देश की आजादी के लिए कानपुर के साहित्यिक पुरोधाओ ने देश के लिए उर्जावान साहित्य लिखकर देश के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए महत्वपूर्ण आलम्ब प्रस्तुत किया है । क्रांतिकारियों की धरती पर कभी क्रांतिकारी साहित्यकारों की कभी कमी नहीं रही । कानपुर को साहित्य की राजधानी मान लेना भी मान लेना तर्क संगत ही होगा । देश के बड़े बड़े साहित्यकारों का कर्म क्षेत्र कानपुर रहा है । इसके अतिरिक्त हिंदी साहित्यकारों का जन्मदाता भी कानपुर रहा है ।
   
     आदि कवि महर्षि बाल्मीकि ( बिठूर) जिन्होंने रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की है वह पवित्र धरती  कानपुर की ही है । काव्य धारा में निराला जी नीरज जी व् अनेक रचनाकारो ने कानपुर के साहित्यिक अमरत्व का परचम लहराया है । आज की चर्चा यदि हम कानपुर के लेखको के सम्बन्ध में करें तो हमें भारतेंदु युग से ही शुरुआत करनी चाहिए ।

      भारतेंदु युग के समकालीन आदरणीय प्रताप नारायण मिश्र जी जिनका कर्म क्षेत्र कानपुर ही रहा है ।आपने कानपुर में नाटक सभा नाम का एक संगठन भी तैयार किया था । आपका कार्य कल 1856 से1895 के मध्य रहा है । मिश्र जी ने सामाजिक कुरीतियों पर गहरा कटाक्ष किया है। मिश्र जी की पहचान कुशल नाटककार ,निबन्धकार ,और अनुवादक के रूप में थी । स्वंत्रता संग्राम में मिश्र जी की कलम समाज में नव चेतना के साथ लोगों को जागरुक किया । स्पष्ट ,सटीक व् सामयिक लेखन के द्वारा देश के हित में उन्होंने सच को लिखना ही बेहतर समझा । लगभग उनकी सभी कृतियाँ देश हित पर ही केन्द्रित मिलती हैं ।
     मिश्र जी ने "ब्रह्मण" नामक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया था ।
    कलि कौतूहल, कलि प्रभाव, हठी हमीर , गो संकट आदि अमर नाटकों की रचना कर कानपुर एवम देश के साहित्य को गर्वान्वित किया है ।

      अंग्रेजी शासन के विरुद्ध कानपुर के महान साहित्यिक पत्रकार लेखक गणेश शंकर विद्यार्थी जी की कलम में अद्भुद लेखन शक्ति थी ।विद्यार्थी जी प्रताप नामक पत्रिका का संपादन किया था । उनके लेख के एक एक शब्द आग उगलते थे । अंग्रेजी शासन और व्यवस्था के खिलाफ उनके लेख बेहद ओजस्वी हुआ करते थे । कहा जाता है सरदार भगत सिंह भी उनसे कभी कभी मिलने आते थे । अपने निर्भीक चिंतन को विद्यार्थी जी ज्यो का त्यों लिखने में कोई संकोच नहीं करते थे । जलियावाला बाग कांड और सरदार भगत सिंह की फांसी पर अपना तीखा विचार विचार प्रवाह उन्होंने प्रताप में प्रकाशित किया था । उनके आजादी के क्रांतिकारी लेख जन मानस पर अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ते थे । गणेश शंकर विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे ।

   एक बार ग्वालियर के महाराज रात्रि भोज पर आमंत्रित कर उन्हें एक शाल भेट की थी ।आशय अप्रत्यक्ष था की प्रताप में ग्वालियर रियासत के लिए नकारात्मक टिप्पणियां ना प्रकाशित हों । विद्यार्थी जी शाल तो ग्रहण कर लिया लेकिन उस शाल का उपयोग उन्होंने जीवन भर नहीं किया । लेखन के प्रति समर्पण भाव का ज्वलंत उदारण आज के पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत है ।
बाद में उन्होंने आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी के साथ उनकी पत्रिका सरस्वती के संपादन विभाग में नौकरी भी किये
  विद्यार्थी जी ने कर्मयोगी , हित वाणी , और स्वराज नामक पत्रों के लिए लेख लिखे । साम्प्रदायिक उन्माद की आग में साम्प्रदायिकता से लड़ते हुए 25 मार्च 1929 को विद्यार्थी जी शहीद हो गये ।

        कानपुर के गौरवमयी स्तंभों में श्यामलाल गुप्त पार्षद जी का नाम बहुत श्रद्धा से लिया जाता है । आपका जन्म 16सितम्बर1893 में  कानपुर के नरबल में हुआ था । पार्षद जी जब कक्षा पांच में पढ़ते थे तब उन्होंने एक कविता लिखी थी -
परोपकारी पुरुष मुहिम में पावन पद पाते देखे ।
उनके सुन्दर नाम स्वर्ण में सदा लिखे जाते देखे।।

      श्याम लाल गुप्त जी ने सचिव नामक मासिक पत्र का संपादन किया । उनके कई क्रांतिकारी लेख व रचनाए क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत रही हैं ।
उनका लिखा हुआ यह गीत -

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ।
झंडा ऊंचा रहे हमारा ।।
उनके इस गीत को बाद में राष्ट्र गीत के सम्मान से नवाजा गया ।
     इस प्रकार कानपुर अनेक महान साहित्यकारों से गर्वान्वित होता रहा है । यदि हम नगर के साहित्यकारों पर दृष्टि पात करें । तो पाएंगे वर्तमान साहित्यकार भी साहित्य की इस परिपाटी को जीवंत रखने में  एक परिमार्जन के साथ अपनी महत्त्व पूर्ण भूमिका हेतु प्रयत्नशील हैं ।

    कानपुर के   वर्तमान प्रसिद्ध कथाकार गिरिराज किशोर जी ना केवल कानपुर बल्कि देश के वरिष्ठ साहित्यकारों के मध्य सशक्त हस्ताक्षर के रूप में पहचाने जा रहे है । गिरिराज जी उत्कृष्ट कथाकार के साथ साथ उपन्यासकार एवम नाटक कार भी हैं ।
  आप पद्म श्री पुरष्कार से अलंकृत हैं । वर्तमान हिंदी साहित्य में गिरिराज जी की अनेको महत्वपूर्ण उपलब्धिया रही हैं ।
      आपकी पुस्तक पहला गिरमिटिया , ढाई घर, अंतर ध्वंस  ,यातना घर अत्यंत प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी हैं ।उनकी नयी पुस्तक मृग तृष्णा काफी चर्चा में है ।

        कानपुर व देश के गौरव के रूप में पहचान बन चुके आदरणीय राजेन्द्र राव जी की कलात्मक और बिंदास लेखन शैली पाठको की पसंद की बुलंदियों को छूने में सक्षम है। निर्विवाद रूप से राव साहब की लेखन विशिष्टता समय के साथ अपनी जीवंत पृष्ठभूमि व लोकप्रियता के परिवर्तन शील उदारता के संग कलमबद्ध करने में सफल हो ही जाती है । राव साहब भी कथाकार के साथ साथ उपन्यासकार भी हैं ।आप समय समय पर उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा पुरष्कृत किये जाते रहे हैं । आपकी महत्वपूर्ण पुस्तकें  असत्य के प्रयोग , पाप पुण्य से परे , सूली ऊपर सेज पिया की ,कीर्तन काफी लोक प्रिय रही हैं । आपकी पहली कहानी का नाम शिफ्ट था ।

      हिंदी साहित्य में यदि कानपुर की चर्चा होगी तो प्रियंवद जी का जिक्र स्वर्णिम अक्षरों में लिपिबद्ध मिलेगा । प्रियंवद जी की अद्भुद लेखन शैली ,निराला अंदाज हरफन मौला वाली तस्वीर अपने आप में उनको अति विशिष्ट बनाती है । बेशक आपकी पहचान एक कथाकार और उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्द है परन्तु मजे की बात यह है की पुस्तक लाल कनेर का फूल उनका काव्य संग्रह है । वह चर्चित और लोकप्रिय पुस्तक है। प्रियंवद जी की पहचान एक इतिहासकार के रूप में भी होती है । आपकी पुस्तक भारत विभाजन की अंतर कथा ऐतिहासिक सन्दर्भों पर आधारित अमर कृति है । आपकी अन्य पुस्तकें बोसिदनी, मुट्ठी में बंद चिड़िया,एक अपवित्र प्रेम ,धर्मस्थल ,परछाई ,नाच विशेष चर्चित रहीं हैं । आपका उपन्यास वे वहां कैद हैं लोक प्रियता के स्तर पर अच्छी पहचान बना चूका है ।

कानपुर के अमरीक सिंह दीप जी की कहानियां गहरी संवेदनाओं से ओत प्रोत होती हैं । दीप जी कानपुर के वरिष्ठ कथाकार हैं । आपकी कहानियां सामाजिक व्यथाओं पर तीखा प्रहार करती हैं और  दीप जी की अपनी कहानियों के माध्यम से पाठक तक अपना मौलिक सन्देश बहुत ही खूबसूरत अंदाज में पहुचाने में सफल हो जाते हैं । वैचारिक क्रांति को जन्म देने में सक्षम दीप जी कहानियों का अंत एक ऐसे मोड़ पर होता देखा गया है जहाँ विचारधाराओं का परिवर्तन स्वाभाविक तौर पर आंदोलित हो जाता है ।
      दीप जी एक कुशल अनुवादक भी हैं आप ने देश विदेश की कई कहानियों का अनुवाद बहुत ही सुन्दर ढंग से किया है । आपकी कहानी संग्रह "कहाँ जायेगा सिद्धार्थ" ,झाड़े रहो कलट्टर गंज ,सिर फोड़ती चिड़िया ,काला हांड़ी ,काली बिल्ली ,एक कोई और , बन पाँखी काफी प्रसिद्ध हो चुकी हैं । दीप जी का उपन्यास एक और पंचाली वर्तमान में प्रकाशित हुआ है । साहित्यिक परिवेश में एक और पांचाली की चर्चा खूब है ।
    कानपुर के साहित्यकारों में वर्तमान में कुछ साहित्यकार हाल के कुछ वर्षों से अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है । इस कड़ी में युवा कथाकार गोविन्द उपाध्याय जी का नाम प्रमुख है । गोविन्द जी देश के सशक्त कथाकारों की कतार में आकर खड़े हो चुके हैं । गोविन्द जी की कहानियों में आंचलिक पृष्ठभूमि की झलक मिलती है । आंचलिकता के मर्मज्ञ कथाकार के रूप में आपकी पहचान बन चुकी है । आज कल देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में आप निरंतर दिख रहे  । गोविन्द जी कहानी संग्रह पंखहीन ,समय रेत और फूकन फूफा ,सोन परी का तीसरा अध्याय ,चौथे प्रहर का विरह गीत ,आदमी कुत्ता और ब्रेकिंग न्यूज जैसी कहानी संग्रह चर्चाओं  रहीं हैं ।
     प्राख्यात साहित्यकार कृष्ण विहारी जी का संबंध भी कानपुर से ही है । कृष्ण बिहारी जी आबूधाबी से साहित्यिक पत्रिका "निकट " का संपादन कार्य देख रहे हैं । आपकी पहली कहानी १९७१ में प्रकाशित हुई थी कृष्ण बिहारी जी कहानियां देश बड़ी हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं में अक्सर देखने को मिल जाती हैं । कृष्ण बिहारी वर्ष में दो माह कानपूर में ही गुजारते हैं । आपकी महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दो औरतें ,पूरी हकीकत पूरा फ़साना ,नातूर ,एक सिरे से दुसरे सिरे तक ,इंतजार श्वेत--- स्याम ---रतनार अच्छी संग्रह के रूप में प्रसिद्ध है । कृष्ण बिहारी जी की नई पुस्तक उसका चेहरा बाजार में आ चुकी है ।


      कानपुर आज उत्कृष्ट साहित्यकारों से भरा पड़ा है । यहाँ की साहित्यिक खुशबू पूरे विश्व में हिंदी जगत के साहित्य को महका रही है । प्रेम गुप्ता मानी और राजकुमार सिंह जैसे अनेक सशक्त साहित्यकारों की चर्चा अधूरी रह गई है । अगले किसी अंक में उनकी चर्चा की जाएगी । प्राचीन और द्विवेदी युग के साहित्यकारों की विरासत को वर्तमान साहित्यकार अपनी पुरजोर लेखन की ताकत से संभालने में कामयाब हैं । सम्पूर्ण पाठक कानपुर के साहित्यिक कथाकारों के उज्जवल भविष्य की कामना करता है । 

मुक्तक- राखी सन्देश

मुक्तक     -राखी सन्देश

ये बंधन  तो  तेरी  तहजीब  की  बेहतर  निशानी  है ।
बहन  के  मान  से  बढ़  कर  कहाँ  ये  जिंदगानी है ।।
बचे  ना  ये  दरिन्दे  अब  ना लटके  शाख से बहना ।
ये  राखी  बांध  तो  ली  है  लाज  इसकी बचानी है ।।


सपथ  रक्षा की  लेकर के ,ये राखी  बांध लेना  तुम ।
मुल्क  में  हैं  तेरी  बहनें ,वक्त  पर  साथ  देना तुम ।।
लुटे ना फिर कभी अस्मत ,यहाँ पावन से रिश्तों की ।
सूत्र रक्षा का गर समझो ,तभी  फिर  हाथ देना तुम ।।


ये  मर्यादा  की  राखी है ,बचन तुझसे भी पाना है ।
उठाकर सर चले भाई ,करम  वो कर  दिखाना है ।।
ना सूखे आँख का पानी ,बुझे ना दीप इज्जत  का।
लाज  पर  दाग  ना आये ,तुम्हें  ये  घर  बचाना है ।।

                       -   नवीन मणि त्रिपाठी

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

सावन में उमंग्यों मेरो मनवा......


मेरा यह लेख हिंदुस्तान समाचार पत्र में 21.7.14 को प्रकाशित हुआ ।



                                                                     -                                         नवीन मणि त्रिपाठी


सावन की हरियाली , मद मस्त हवाएँ ,रिमझिम फुहार , काले काले बादल  , दादुर के मीठे गीत, नाचते हुए मोर ,फलों से लदे पेड़ ,झूलों से कजरी और सावन के गीतों की मिठास , भला कौन होगा जो भाव विभोर होने से अपने आप को रोक सके ? एक चुंबकीय आकर्षण से परिपूर्ण यह मधुमास अंग अंग में नव स्फूर्ति और जादुई तरंगों से मन को रोमांचित कर जाता है । यह मॉस भगवान शिव तक को अपनी आकर्षण शक्ति से खीच लाता है । कहा जाता है भगवान शिव सावन मॉस में पृथ्वी लोक में ही विचरण करते हैं ।

     भारतीय हिंदी साहित्य में यह मधुमास जब जब आया तब तब साहित्य भी अपनी उफान पर रहा । सावन के प्रभाव से साहित्य कभी अपने आप को अछूता नहीं रख सका । प्राचीन काल से अब तक साहित्य में सावन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है । प्रणय के स्वर इस मॉस में स्वतः अपने चरम पहुँच जाते हैं । मिलान की आशाएं ऊर्जावान हो जाती हैं । संयोग और वियोग की परिभाषाएं दृष्टिगोचर हो उठती हैं । यह अद्भुद दृश्य देख कर कवियों की लेखनी का सक्रिय  होना स्वाभाविक है । सूरदास जी लिखते हैं -
प्रीती तौ  मरिबौऊ ना विचारे ।
सावन मॉस पपीहा बोले, पिय पिय करि जो पुकारे।
सूरदास प्रभु दरसन कारन ,ऐसी भाँति विचारे ॥ (सूरसागर ८८ )

    सावन मॉस में प्रीति  की पराकाष्ठा का इससे बेहतर उदहारण दुर्लभ है । विरह की उत्कृष्ट संवेदना मात्र सावन में ही जागती  है । गोस्वामी तुलसी दास जी का तो सावन से बहुत ही गहरा संबंध है । पंद्रह सै चौवन विषै कालिंदी के तीर । सावन शुक्ला सप्तमी तुलसी धरेउ शरीर॥ आपका तो जन्म ही सावन में हुआ है । गोस्वामी जी ने सावन में प्रभु के प्रति उपजे प्रेम की व्याख्या बड़े ही सरल शब्दों में कर दी है ।
वरखा रितु रघुपति भवति, तुलसी सालि सुदास ।
राम  नाम  बर  बरन  जग, सावन  भादव  मॉस ॥
         दूसरी ओर  सावन के प्रभाव के संबंध में गोस्वामी जी लिखते हैं -
उरवी   परि  कलहीन  होइ, ऊपर   कला  प्रधान ।
तुलसी देखि कलाप गति ,सावन घन पहिचान ॥
       अतः जब मोर के पंख जमीन को छूते हुए चलते हैं तब वे कलाहीन  होते हैं लेकिन सावन के बादलों को देख कर वे ऊपर उठकर कला से परिपूर्ण हो जाते हैं । सावन मॉस में गोस्वामी जी ने उक्त पंक्तियों से प्रणय के कौतूहल का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत कर दिया हैं ।

    मीरा के नारी मन की संवेदना भी सावन में अछूती नहीं रही है । उनकी लोकप्रिय रचना -
बरसे बदरिया सावन की ,
सावन की मन भावन की ।
सावन में उमंग्यो मेरो मनवा ,
भनक सुनी हरि आवन की ।

सावन की  उमंग का  जीवंत प्रभाव लेकर रचना आज भी लोगों की जुबान पर अपना अस्तित्व बनाये रखने में सफल है ।
    आधुनिक कवियों ने तो सावन की छटाओं पर खूब लेखनी चलाई है । कवि हरिवंश राय बच्चन जी ने लिखा है -
सिंचित सा कंठ पपीहे का ,
कोयल की बोल है भीगी सी ,
रस डूबा स्वर में उतराया ,
अब दिल बदले घड़ियाँ बदली
यह गीत नया मैंने गया ।
साजन आये ,सावन आया ॥

    कानपुर की धरती में जन्मी साहित्य जगत को महिमामंडित करने वाली पहचान आदरणीय गोपालदास नीरज जी अपने कनपुरिया अंदाज में प्रणय संवेदनाओं को सावन से जोड़ते हुए कहते हैं -

यदि मै होता घन सावन का ।
गोल  कपोलो  पर  लुढ़का  कर ,प्रथम  बूँद  वर्षा  की ।
याद दिलाता मिलन प्रात वह प्रथम प्रथम चुम्बन का ॥
यदि मै होता घन सावन का ।

   महान कवि निराला जी भी अपने अंतर मन की भावनाओं  को सावन की धारा में बहने से नहीं रोक सके । कनपुरिया अनुभूति व अभिव्यक्ति तो साहित्यिक सुरम्यता समाहित कर ही लेती है । निराला जी ने लिखा है -
फिर लगा सावन मन भावन  झूलने घर घर पड़े ।
सखि चीर साड़ी की सवांरी झूलती झोंके बड़े ।
वन मोर चारों ओर बोले पपीहे पी पी रटे ।
ये बोल सुनकर प्राण बोले ,ज्ञान भी मेरे हटे ॥


     सावन में पृथ्वी से गरजते बादलों का आलिंगन , सब कुछ प्रेम मय कर देता है चारों दिशाओं की हवाएँ शीतलता के संग गुनगुनाती से प्रतीत होती हैं । सावन का चुंबकत्व चेतना शून्य कर देता है । मन के आवेग प्राकृतिक छटाओं में लीन  हो जाते हैं । तभी तो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने प्रणय निवेदन की पंक्तियाँ सावन में लिख गए -

जेठ नहीं यह जलन ह्रदय की ,
उठ कर जरा देख तो ले ,
जगती में सावन आया है
मायाविनी सपने धो ले ।


     हिंदी साहित्य में अनेक कवियों ने अपनी कलम से सावन की अनुभूतियों को जीवंत किया है । कल्पनाओं का ज्वार सावन में जरूर आता है । विरह वेदनाओं के स्वर तीव्र हो जाते हैं । हर ओर  प्रियतम से मिलन की अपेक्षाएं प्रकृति की रंगीनियों के साथ ताल से ताल मिला रही होती हैं । प्रकृति के कण कण में रोमांच होता है । प्रकृति की निकटता का अनुभव ही कवि व साहित्यकार का जन्मदाता बन जाता है । जब जब सावन आया साहित्य के पुरोधाओं की  लेखनी से अमर रचनाएँ बरसती रहीं हैं ।

                           इति 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

ऐ खुदा कातिल तेरी मजहब परस्ती हो गयी है

                 गजल (इराक त्रासदी)

जिन्दगी  महँगी  यहाँ  पर  मौत  सस्ती   हो   गयी   है ।
जल   रही  इंसानियत  बदनाम   बस्ती  हो   गयी  है ।।

ये नबाबों  का  शहर भी  लाश  का  इक  ढेर है  अब ।
मिट  रहा   है  ये चमन  बरबाद  हस्ती  हो   गयी  है ।।

खुश  हैं   सौदागर   बहुत  शातिर   इरादों  को  लिए ।
असलहो  को  बेच  कर उनकी भी  मस्ती हो गयी है ।।

खून   की  नदियाँ   बहाना  बन   चुका   तहजीब  है ।
इस रियासत की  यहाँ  हालत भी  खस्ती  हो गयी है ।।

छिप  रहे   मासूम  अपनी  माँ  के  आँचल  में   यहाँ ।
शायद दहशतगर्द  की  गलियों  में  गश्ती  हो गयी है ।।

हर  तरफ   खामोसियाँ  हैं   मौत   की  आहट   बहुत ।
हर जुबाँ  के  लफ्ज   पर  बे  वक्त  शख्ती हो  गयी है ।।

डूबना    मुमकिन   बहुत   है  जंग   की    मजधार  में।
देख  जरजर   ये   पुरानी   तेरी   कश्ती  हो  गयी  है ।।

अब    तुझे    सिजदा   करे   कैसे    यहाँ    इंसानियत ।
ऐ  खुदा   कातिल   तेरी  मजहब परस्ती  हो  गयी है ।।

 .................नवीन..................