तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

शनिवार, 3 जून 2017

ग़ज़ल --खुशामद की बलाएँ बेशबब बीमार करती हैं

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वो अक्सर  बेरुखी से  वक्त  का  दीदार करती हैं ।
हवाएं  इस  तरह  से  जिंदगी  दुस्वार  करती  हैं ।।

न  जाने  क्या  मुहब्बत  है हमारी हर  तरक्की से ।
हज़ारों मुश्किलें हम  से ही  आंखें चार करती हैं ।।

बड़ी चर्चा है वो  बदनामियों से अब  नहीं  डरता ।
है  उसकी हरकतें ऐसी  दिलों को  ख्वार करतीं हैं ।।

जिन्हें खुद पर भरोसा ही नही रहता है मस्जिद में ।
उन्हें तो रहमतों  की  ख्वाहिशें लाचार  करती  हैं ।।

न् जाओ तुम कभी मतलब  परस्तों  के इलाके  में ।
खुशामद  की  बलाएँ  बेशबब  बीमार करती हैं ।।

वफ़ा चाहो वफ़ा पढ़ लो जफ़ा चाहो जफ़ा पढ़ लो ।
तुम्हारी  चाहतें  मुझको  खुला अखबार  करती हैं ।।

सँभल के चल मेरे साथी निगाहें हैं बड़ी जालिम ।
सुना  है  वारदातें   वो   सरे   बाज़ार   करतीं  हैं ।

उन्हें कैसी अदावत है समझना भी हुआ मुश्किल।
दुआएं   पास  आने  से  मेरे  इनकार  करतीं  हैं ।।

न पूछो हाल अब उसका बहुत चर्चा है जोरों पर ।
अदाएं गैर की महफ़िल गुले गुलज़ार करती हैं ।।

              नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित
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ग़ज़ल --कश्मीर हमारा है हमारा ही रहेगा

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भारत की बुलन्दी का सितारा ही रहेगा ।
कश्मीर  हमारा  है  हमारा  ही   रहेगा ।।

हालात   बदलने  में  नहीं  देर   लगेगी ।
प्यारा है हमें मुल्क तो  प्यारा ही रहेगा ।।

हम एक थे  हम एक  हैं  हम  एक  रहेंगे ।
यह  दर्द तुम्हारा  है  तुम्हारा  ही  रहेगा ।।

बरबाद  नहीं  होगी शहीदों  की निशानी ।
इतिहास  में  हारा  है  तू  हारा ही रहेगा ।।

ऐ  पाक  कहाँ  साफ़  रहा है तेरा दामन ।
है तुझ से किनारा तो  किनारा ही  रहेगा ।।

यह ख्वाब न् पालो के कभी तोड़ सकोगे ।
यह  ख्वाब  कुँवारा है कुँआरा ही  रहेगा ।।

फंडिंग के लिए देख  मेरा  काम  जबाबी ।
हर   वार  करारा  है  करारा  ही   रहेगा ।।

बेशर्म हिमाकत से  यूँ पत्थर  न्  चला तू।
किस्मत का तू मारा है तो मारा ही रहेगा ।।

कॉपी राइट --- नवीन मणि त्रिपाठी
             मौलिक अप्रकाशित

सारा चेहरा गुलाब है यारों

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वो     दिखी     बेनकाब   है   यारों।
सारा    चेहरा     गुलाब  है   यारोँ ।।

अच्छी  सूरत  भी  क्या  बुरी शय है ।
सबकी   नीयत   खराब   है  यारों ।।

है लबों  पर  अजीब  सी  जुम्बिश ।
कैसा    छाया   शबाब   है   यारों।।

होश  खोया  है   देख  कर  उसको ।
वह     पुरानी    शराब   है   यारों ।।

एक    मुद्दत   के   बाद   देखा   है ।
हुस्न    पर     इंकलाब   है    यारों।।

मैं   जिसे   सुबहो   शाम  पढ़ता  हूँ ।  
वह   ग़ज़ल   लाजबाब   है   यारों ।।

मत  पढो  जिंदगी   का   हर  पन्ना ।
बेबसी     की    किताब    है  यारों।।

पैरहन   ख्वाब   में   वो   आती   है ।
कितनी    आदत   खराब   है  यारों ।।

क्या   सुनाऊँ   मैं   बात   रातों  की ।
वो    कोई     माहताब     है   यारों ।।

आज    बादल   जमीं    पे   बरसेंगे ।
तिश्नगी      बेहिसाब      है      यारों ।।

जिस से  मिलने गए थे महफ़िल  में ।
वह      मेरा     इंतखाब    है  यारों ।।

                   ---नवीन मणि त्रिपाठी
                 मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --नफरत का सियासत में चलन देख रहे हैं

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अब हम भी  ज़माने का सुख़न देख रहे हैं ।।
बिकता  है  सुखनवर  ये  पतन देख रहे हैं ।।

बदनाम न्  हो  जाये  कहीं  देश का प्रहरी ।
नफरत का सियासत में चलन  देख रहे हैं ।।

वो  मुल्क  मिटाने  की  दुआ  मांग  रहा   है ।
सीने  में   बहुत  आग   जलन  देख  रहे  हैं।।

सब भूंख मिटाते हैं वहां  ख्वाब दिखा  कर ।
रोटी   की  तमन्ना  का  हवन  देख  रहे  हैं ।।

वादों  पे  यकीं  कर के गुजारे  हैं कई साल ।
मुद्दत  से  गुनाहों  का  चमन  देख  रहे  हैं ।।

लाशों   में  इज़ाफ़त  तो  कई  बार  हुई   है ।
अम्नो  सुकूँ  का  आज शमन देख  रहे  हैं ।।

इज्जत जो लुटी आज सड़क पे है तमाशा ।
चेहरों पे  जलालत का  शिकन देख रहें हैं ।।

पत्थर  वो  चलाते  है सरे  आम  वतन  पर ।
बदले  हुए  मंजर  में  चुभन  देख  रहे   हैं ।।

भगवान  से  क्यों  दूर  हुए  आज  पुजारी ।।
दौलत  के  ठिकानों  पे  भजन  देख रहे हैं ।।

रोटी  ही  नहीं पेट  में जीना भी  है मुश्किल ।
अब  रोज तबस्सुम  का  दमन  देख रहे हैं ।।

नम्बर मे वो अव्वल था वो कोटे में नहीं था ।
इंसान की  हसरत  पे  कफ़न  देख  रहे  हैं ।।

           ---  नवीन मणि त्रिपाठी
               मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --कुछ लोग मुहब्बत को आबाद नहीं करते

वज़्न    -   221 1222 221 1222
पिजरे  से  परिंदे  को  आज़ाद  नहीं   करते ।
कुछ लोग मुहब्बत को  आबाद  नहीं  करते ।।

फ़ितरत है पतंगों  की  शम्मा  पे  मचलने की ।
ऐसे  जुनूं  पे  आलिम  इमदाद  नहीं  करते ।।

वह दर्द मिटाने  का  वादा  किया  था  वरना ।
रह रह  के मुकद्दर  को हम  याद नही  करते ।।

ज़ालिमकी अदालत में सचपर गिरी है बिजली
मालूम   अगर   होता  फरियाद  नही  करते ।।

वो साथ निभाएंगे कहना है बहुत मुश्किल ।
वो  वक्त  कभी  हम  पर बर्बाद नहीं करते ।।

हसरत  ही  मिटा बैठे कुछ लोग ज़माने में ।
खुशियों की तमन्ना  को  ईज़ाद नहीं करते ।।

दरिया  का  समंदर  से  मिलने का इरादा है ।
बेबाक   भरोसे  पर   सम्वाद  नहीं   करते ।।

देखेंगे  नहीं   मुझको  गर  राज  पता  होता ।
महफ़िल की बड़ी  लम्बी  तादाद नहीं करते ।।

कहा किसने तेरा परचम नहीं है

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अना  की बात में कुछ  दम  नहीं  है ।
कहा   किसने  तेरा  परचम नहीं  है ।।

मिलेंगी  कब  तलक  ये  स्याह रातें ।
तेरी  किस्मत  में क्या पूनम नही है ।।

अभी तक मुन्तजिर है आंख उसकी ।
वफ़ा  के नाम पर कुछ कम नहीं है ।।

चिरागे  इश्क़  पर  है  नाज़   उसको ।
उजाला  भी   कहीं  मध्यम  नहीं  है ।।

सजा    देंगे    हमे   ये    हुस्न  वाले ।
हमारे  हक़   का  ये  फोरम  नहीँ है ।।

तेरी  जुल्फों  की  मैं  तश्वीर रख लूँ।
मगर  मुद्दत से  इक अल्बम नही है ।।

मिटा  बैठा  है  वो  उल्फ़त में हस्ती ।
उसे   बर्बादियों   का   गम  नहीं  है ।।

अनासिर  से  मुकम्मल है बदन  वो ।
कहा  कसने   बदन  संगम  नहीं  है ।।

नहीं  है  वस्ल  का मौसम कहो मत ।
तुम्हारी   तिश्नगी   में   दम  नहीं   है ।।

सहर  को  मान लूँ  मैं सच  भी  कैसे ।
गुलों  पर  रात  की  शबनम  नहीं  है ।।

अना  के  साथ  मत  यूँ  पेश  आओ।
मेरी  ग़ज़लों  का  तू  उदगम नहीं है ।।

बहुत  मुमकिन  मुहब्बत  जीत  जाए ।
 छुपा    कोई   वहाँ   रुस्तम  नहीं   है ।।

है  गर   जज़्बा  तो  मेरे  पास  आओ ।
जिगर   तक   रास्ता   दुर्गम  नहीं  है ।।

किसी  का जख़्म  मत पूछा  करो  यूँ ।
तुम्हारे  पास  जब  मरहम   नहीं   है ।।

अजब  क़ातिल से  उसका  वास्ता  है ।
सजाये   मौत   पर   मातम  नही   है ।।

                 ----नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल --है सुनी उसने भी कल मेरी ग़ज़ल

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कर  गई  अपनी  पहल  मेरी  ग़ज़ल।
है सुनी  उसने  भी  कल  मेरी ग़ज़ल।।

हर्फ़   चेहरे  पर  उभर  कर  आ  गए ।
इश्क पर  रखती  दखल  मेरी ग़ज़ल।।

सुर्खरूं  होती   गई  वह   बे  हिसाब ।
होठ पर  जाती  मचल  मेरी  ग़ज़ल ।।

तोड़ ले कोई भी  गुल को  शाख से ।
है कहाँ  इतनी  सरल  मेरी  ग़ज़ल ।।

यूँ नज़र  मत आइये  मुझको सनम ।                          देखकर  जाती  बदल  मेरी  ग़ज़ल ।।

मत कहो उसको फरेबी  तुम  कभी ।
बात  पर  रहती  अटल मेरी ग़ज़ल ।।

शेर  की   गहराइयों  में   डूब   कर ।
फिर गई  थोड़ी सँभल  मेरी  ग़ज़ल।।

उसकी सूरत देख कर जब भी लिखी ।
फिर खिली जैसे  कंवल मेरी  ग़ज़ल।।

कुछ  उसूलों  के  तले  यह  दब  गई ।
 पी रही अब  तक गरल मेरी  ग़ज़ल ।।

बह्र  हो  या  काफ़िया  या  वज़्न  हो ।
बाद मुद्दत  के  सफल   मेरी  गज़ल ।।

       नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल

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सिर्फ  चन्द बातों  से  मिल  गई  नसीहत  है ।
आइनों से  मत पूछो क्या मेरी  हक़ीक़त  है ।।

शब  उदास  है  शायद  कुछ सवाल  बाकी हैं।
वस्ल की इजाज़त पर  हो गई  किफ़ायत  है ।।

चाँद  के  निकलने  तक मुन्तजिर  रहा  कोई ।
ईद  की  तमन्ना   पर  इश्क़  की   इनायत है ।।

बाद  मुद्दतों  के  जब  मिल  गई  नज़र  उनसे ।
कुछ मिला सबक उनसे कुछमिली हिदायत है।।

सांस   की  हरारत  को  धड़कनें   बताती   है ।
तिश्नगी  में उसके  भी  कुछ  नई इज़ाफ़त है ।।

दिल छुपा के आया  था लुट  गया मुहब्बत में ।
रहबरोँ से वाकिफ हूँ  हुस्न  की  हिमाकत है ।।

जिंदगी   की   रातें  सब   इंतजार   में  गुज़रीं ।
दे  गया  हमें   कोई    दर्द   की   वसीयत   है ।।

पढ़   रहा   निगाहों   से  रात  दिन  तुझे   कोई ।
बे  शबब  नही   होती  अब   कोई  इबादत  है ।।

             -- नवीन मणि त्रिपाठी

बुधवार, 31 मई 2017

शायर हूँ यकीनन मेरी पहचान यही है

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सबसे  न   बताओ   के  परेशान  यही  है ।
 शायर हूँ यकीनन  मेरी  पहचान यही है ।।

यूँ ही न् गले मिल तू जरा सोच  समझ ले ।
इस शह्र  के  हालात  पे  फरमान यही है ।।

कहने लगी है आज से मुझकोभी सरेआम ।
ठहरा है जो  मुद्दत से वो  मेहमान यही है ।।

बर्बाद गुलिस्तां को सितम गर ने किया जब।
लोगो  ने   कहा  प्यार  का  तूफ़ान  यही है ।।

अक्सर  ही  नकाबों  में छुपाते  हैं ये चेहरा ।
बैठा  जो  तेरे   हुस्न   पे   दरबान  यही  है ।।

लाती  हैं  हवाएं  मेरे  महबूब   की  खुशबू ।
शायद  मेरी  तक़दीर  में   बागान  यही   है।।

ठहरो  किसी दीवाने को मुजरिम न् बनाओ ।
मिलता  जो  मुहब्बत  वो  इंसान  यही  है ।।
         -- नवीन मणि त्रिपाठी

सोमवार, 29 मई 2017

ग़ज़ल गर चाहते हो रिन्द को तो इश्तिहार हो।

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 थोड़ी  तसल्लियों   में   कोई  इंतजार  हो ।
माना  कि  आज तुम जियादा बेकरार हो ।।

वह  मैकदों के पास से  गुजरा नहीं कभी ।
 गर चाहते हो  रिन्द  को तो इश्तिहार हो ।।

निकला हैआज चाँद शायद मुद्दतों के बाद।
अब वस्ल पर वो फैसला भी  आरपार  हो।।

आया शिकार पर न् वोखुद  ही शिकार हो।            इतना  खुदा  करे उसे  बेगम  से प्यार हो ।।

लिक्खा दरख़्त पर किसी पगली ने कोई नाम।
शायद  गरीब  दिल   की  कोई यादगार  हो।।

हालात हैं खराब क्यों कुछ सोचिये  जनाब ।
मुमकिन कहीं  नसीब में  गहरी  दरार  हो ।।

कुछ इस तरह से क़ैद में रखिये उसे  हुजूर ।
ऐसा न् हो कि इश्क का मुजरिम फरार हो।।

आये नही वो आज भी महफ़िलके आसपास ।
पूछो  कहीं  न् और भी  सजता दयार  हो ।।

रोते दिखे  हैं आप भी रुख़सत पे बेहिसाब ।
शायद किसी अदा पे कोई जाँ  निशार हो ।।

                           -- नवीन मणि  त्रिपाठी

                          मौलिक अप्रकाशित

हसरतें तब हलाल करती हैं

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ताकतें    पायमाल   करती   हैं ।
ख्वाहिशें तब हलाल करती हैं ।।

खा  रहे  वे  हराम  की  दौलत ।
रोटियाँ  तक मलाल  करती हैं ।।

मर  रहे  भूंख  से   यहां   अदने।
कुर्सियां क्या खयाल  करती  हैं ।।

हाल   कैसे   तुझे   बताएं   हम ।
चुप्पियां  ही  सवाल  करती  हैं ।।

वह  नमाज़ी  भी  हो  गया तेरा ।
तेरी आंखें  कमाल  करती   हैं ।।

आज मुश्किल है यार से मिलना ।
वस्ल  में   अंतराल   करती   हैं ।।

उस का चेहरा  बुझा बुझा सा है ।
तोहमतें कब  निहाल  करतीं  हैं ।।

हैं कहाँ  वे वफ़ा के काबिलअब ।
बे  अदब  का मज़ाल करती  हैं ।।

यह ज़माने  का  है असर   देखो ।
वे   दुपट्टा   रुमाल   करती   हैं ।।

ग़ज़ल --जहां मतलब परस्ती हो वहां उल्फ़त नहीं अच्छी

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यहां  की  नाज़नीनो  में पली  हसरत  नहीं  अच्छी ।
जहाँ मतलब  परस्ती हो  वहाँ  उल्फत नहीं अच्छी ।।

बड़ा   खतरा   मुहबत  से  ये   हिंदुस्तान   है  यारों ।
हसीनों के चमन में अब कोई ग़फ़लत नहीं अच्छी ।।

हुए  बरबाद   हम   तेरी  निगाहों   की  शरारत  से ।
मेरी बर्बादियों  पर  फिर तेरी  रहमत  नहीं अच्छी ।।

गुजर   जातीं   हैं  ये   रातें  कई  मजबूरियां   लेकर ।
सनम  से  लोग कहते  हैं  मेरी सोहबत नहीं अच्छी ।।

बड़ी कमसिन  अदाएं हैं  नज़र को  फेरना  मुश्किल ।
है मौसम आशिकाना भी मगर किस्मत नहीं अच्छी ।।

बड़े  जालिम  इरादे   हैं  ये  कातिल   हुस्न  वाले  हैं ।
इन्हें  सर  पर  चढ़ाने   की  नई  आदत  नहीं अच्छी ।।

ज़रूरत  पर  जो  दौलत  काम आने से  मुकर जाए ।
हिफ़ाज़त  में  रखी  ऐसी  कोई  दौलत  नहीं अच्छी ।।

बनावट  का  तबस्सुम  हो  दिलों  में खार हो जिंदा  ।
मियां!मक़सद के चाहत में हुई खिदमत नहीं अच्छी ।।

सुकूँ  गर  चाहिए  तो सिर्फ  बेगम की  खुशामद कर ।
किसी  से  इश्क  कर लाई गई  आफ़त नहीं अच्छी ।।

कहा  तू  मान  ले  मेरा   या   फिर  कोई  तरीका  दे ।
ग़ज़ल  के  वास्ते  हमसे  तेरी   हुज़्ज़त  नही अच्छी ।।

अगर  मंजूर   तुझको  है  तो  मेरा  हक़  मुझे  दे  दे ।
कभी  खैरात  में  बटती  कोई  इज्जत नहीं अच्छी ।।

हमारे   पास  जो   भी   था   तुम्हारे   वास्ते   ही  था।
लगी अपनों की जेबों पर तेरी हिकमत नहीं अच्छी ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल पढ़ने वालों ने पढ़ लिया होगा

2122 1212 22

उसके चेहरे  पे  कुछ लिखा  होगा ।
पढ़ने  वालों  ने  पढ़  लिया होगा ।।

यूँ   नही    हैं     तमाम     दीवाने ।
हुस्न  शायद   नया   नया   होगा ।।

सिलवटें    दे   रहीं    गवाही  सब ।
मौत  से  वह   बहुत  लड़ा   होगा ।।

जुल्म से अब भला  है  डरना क्यों ।
मेरे    खातिर    मेरा  खुदा   होगा ।।

सुर्ख   लब   से  शराब   पीकर  वों।
होश   खोकर   कहीं   पड़ा  होगा ।।

तुझसे मिलना भी इक  कयामत है ।
क्या  मुकद्दर   का   फैसला  होगा ।।

उनसे   कह    दो   न  रास्ता   रोकें ।
मेरा  दिलवर   बहुत   खफा  होगा ।।

आ   भी  जाओ   मेरी  जरूरत  हो ।
तुझसे  मिलकर  मेरा  भला  होगा ।।

छोड़ कर चल  दिया शराफत को ।
कोई    धोखा   कहीं   हुआ होगा ।।

वस्ल तय  था मगर ख़बर क्या थी ।
इस  तरह  से  कभी  जुदा  होगा ।।

लोग  कहते  हैं  खास  अफसर है ।
ढूढ़िये   धन    कहीं   दबा   होगा ।।

घर   जलाकर    मेरा  चले   आये ।
ये  रकीबों   का   मशबरा    होगा ।।

पत्थरों  पर  है   सियासत  काफी ।
मुल्क  करवट  बदल  रहा   होगा ।।

हैं   उमीदें  तमाम   जनता     की।
उसके आने से कुछ भला होगा ।।

             -- नवीन मणि त्रिपाठी

कुछ लहू भी लगता है आशियाँ बनाने में

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चाहतें    जवाँ   होगी  इस तरह ज़माने  में ।
है  कहाँ  तेरा  सानी  बिजलियाँ  गिराने  में ।।

दौलतें   नही  काफी  प्यार  भी  जरूरी   है ।
कुछ लहू भी लगता है आशियाँ  बनाने  में ।।

बे नकाब  मत  आना  ये मेरा  तकाज़ा  है ।।
उम्र    बीत  जाएगी   हुस्न  को  भुलाने   में ।

रूठ  कर  नहीं  जाना बेकरार  महफ़िल से ।
हस्तियां  मिटी  कुछ  हैं महफिले  सजाने में ।।

वो किसीकी ख्वाहिश में घरको छोड़ आई है ।
लुट  गए  हजारों  घर  इश्क़ आजमाने  में ।।

रात   के  अंधेरों   में   आरजू  बिखरती  है ।
रोज  टूट जाता हूँ दिल से  दिल मिलाने में ।।

मुद्दतों की यादें थीं  जल  गई वो  बस्ती भी ।।
क्या  मिला  रकीबों  से आग  को लगाने  में ।।

सुर्ख  है  तेरा  चेहरा  मैकसी  का  आलम  है ।
रूह क्यों  हिचकती है जिस्म को जगाने में ।।

तेरी   आसनाई  में  कुछ  नया  तो  होगा ही।
आसुओं से भीगे हम  इक  ग़ज़ल सुनाने में ।। 

                   -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - कहीं ये नीयत फिसल न जाये

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नई    जवानी     नई      अदाएं 
कहीं  ये नीयत फिसल न् जाए ।।
जरा  सँभालो   अदब  में  पल्लू 
कोई  इरादा  बदल  न्    जाए ।।

कबूल   कर   ले   सलाम   मेरा 
ऐ  हुस्न  वाले  तुझे  है  सज़दा ।
मेरी  मुहब्बत  का  दौर  यूं   ही 
तेरी  ख़ता से निकल  न्  जाए ।।

बड़ी  तमन्ना  थी  महफ़िलो  की 
ग़ज़ल  में  उसके  पयाम   होगा ।
उधर  है   दरिया  में   बेरुखी  तो 
इधर  समंदर  मचल  न्   जाए ।।

है  क़त्ल   का  गर   तेरा   इरादा 
तो  दर्द  देकर  गुनाह  मत  कर ।
हराम      होगा  ये   इश्क़     तेरा 
ख़ुदा के घर तक दखल न् जाए ।।

अगर ज़मीं  में  है   तिश्नगी  कुछ 
तो   बादलों   पर  यकीन  रखना ।
तेरी     बेसब्री    बड़ी   जुदा    है 
तमाम ख्वाहिश निगल  न् जाए ।।

ये   गर्म    झोंके    बता    रहे   हैं  
वो आग अब  तक  बुझी  नहीं है ।
खुदा  से   इतनी   सी  इल्तज़ा  है 
वो मोम का  घर  पिघल न्  जाए ।। 

न्    राज   पूछो    मेरी    जुबाँ   से 
मेरी     मुहब्वत    तबाह    होगी ।।
मैं   जख़्म  अपना   छुपा  गया  हूँ  
ये   दिल  तुम्हारा  दहल  न् जाए ।।

                 --नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल।

2122 1212 22

बेसबब   वह   वफ़ा  नहीं  करते ।
खत  मुझे यूँ  लिखा नहीं करते ।।

है  मुहब्बत   से   वास्ता    कोई ।
उसके आँचल उड़ा  नहीँ करते ।।

लूट  जाते  हैं  जो  मेरे  घर  को ।
गैर  वह  भी  हुआ  नहीं  करते ।।

बात  कुछ  तो   जरूर  है  वर्ना ।
तुम  हक़ीक़त  कहा नही करते ।।

न्याय  बिकता  है इस ज़माने में ।
बिन  लिए  फैसला  नही करते ।।

वह गवाही भी बिक गई कब की ।
अब  भरोसा  किया नही करते ।।

जश्न  लिखता  हयात को बन्दा ।
जिंदगी  से  डरा  नहीँ   करते ।।
  
है भरोसा  जिन्हें  यहां  खुद  पर ।
वह खुदा से   दुआ  नहीं करते ।।
                   
थोड़ी   तहज़ीब   भी  जरूरी  है ।
महफिलों  से  उठा नहीं  करते ।।

और   चेहरा   खराब  होता   है ।
दाग ऐसे   धुला  नहीं   करते ।।

पूछिये  रात  माजरा  क्या  था ।
यूँ ही काजल  बहा नहीं करते ।। 

टूट  जाये  कहीं   न्  दिल  कोई।
इस तरह ख़त लिखा नहीं करते ।। 

कुछ तो अय्याशियां  रहीं   होंगी ।
नाम  यूँ  ही  मिटा  नहीं  करते ।। 

है  खुमारी   तमाम  चेहरे  पर ।
कौन कहता नशा नहीं करते ।। 

जो हिफ़ाज़त में हुस्न रखते हैं ।
रहजनों  से  लुटा  नहीं करते ।। 

              --नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -- हो सके मुस्कुरा दीजिये

212 212 212
चाहतों   का  सिला   दीजिये ।
हो   सके   मुस्कुरा    दीजिये ।।

टूट     जाए   न्   ये   जिंदगी।
हौसला   कुछ  बढा   दीजिये।।

गफलतें   हो   चुकी  हैं  बहुत ।
रुख़   से  पर्दा  हटा    दीजिये ।।

देखिए    हाल    बेहाल     क्यूँ ।
आप  ही   कुछ   दवा  दीजिये ।।

बेवफा  कह   दिया   क्यो उसे ।
राज   है  क्या   बता   दीजिये ।।

लूट  कर  ले  गई  सब   नजर ।
यह रपट  भी  लिखा  दीजिये ।।

टूटकर  वह   बिखर  ही   गई ।
जाइये   घर    बसा    दीजिये ।।

है    जरूरी    मुलाकात   भी ।
रास्ता    इक   बना   दीजिये ।।

दीजिये  जाम   उसको   मगर ।
थोड़ा    पानी   मिला  दीजिये ।।

जो  हुई   थी  ग़ज़ल  याद  में ।
आज फिर वह  सुना दीजिये ।।

वह  बहुत  कह  चुका  है बुरा ।
आइना  अब  दिखा  दीजिये ।।

उम्र   कातिल   हुई   आपकी ।
तीर    सारे    चला   दीजिये ।।

नींद   आती   नहीं   रात  भर ।
ख़त   पुराने   जला   दीजिये ।।

          --नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - काम कब तक चलेगा बातों से

2122 1212 22
हैं      सदायें    तमाम   लाशों  से ।
काम  कब  तक चलेगा बातों  से ।।

फिर  कड़े  फैसले की  बात  हुई ।
सिर्फ  मरहम  मिला वजीरों  से ।।

कर  न् पाए वो  फैसले अब तक ।
सीख    लेते  कहाँ  हैं जख्मों से ।।

खो  दिया क्यूँ  मेरे  जवानों  को ।
प्रश्न    उठने    लगे  हज़ारों  से ।।

कुर्सियां    छोड़  दें ये  नालायक ।
बात    कहिये  ये  हुक्मरानों  से ।।

मौत   आती     रही  है   हिस्से में ।
कर   सके   खाक आसमानों  से ।।

गोलियां    ही  इलाज  है  उनका ।
मांगिये  जान  मत   जवानों  से ।।

हाथ में   फिर  उठा  लिया पत्थर ।
बात    मत  कर  हरामजादों  से ।।

 उनकी फ़ित्रत  कभी  नही बदली ।
मौत   लिखने  लगे  जिहादों  से ।।

पत्थरों   से   है  परवरिश  उनकी ।
रोटियां   मिल   रहीं   विवादों से ।।

जुर्म  की   इंतिहाँ    पे    खामोशी ।
उन  को  फुरसत  कहाँ चुनावों से ।।

            --- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -- सारा चेहरा गुलाब है यारों

2122 1212 22
वो     दिखी     बेनकाब   है   यारों।
सारा    चेहरा     गुलाब  है   यारोँ ।।

अच्छी  सूरत  भी  क्या  बुरी शय है ।
सबकी   नीयत   खराब   है  यारों ।।

है लबों  पर  अजीब  सी  जुम्बिश ।
कैसा    छाया   शबाब   है   यारों।।

होश  खोया  है   देख  कर  उसको ।
वह     पुरानी    शराब   है   यारों ।।

एक    मुद्दत   के   बाद   देखा   है ।
हुस्न    का     इंकलाब   है    यारों।।

मैं   जिसे   सुबहो   शाम  पढ़ता  हूँ ।  
वह   ग़ज़ल   लाजबाब   है   यारों ।।

मत  पढो  जिंदगी   का   हर  पन्ना ।
बेबसी     की    किताब    है  यारों।।

पैरहन   ख्वाब   में   वो   आती   है ।
कितनी    आदत   खराब   है  यारों ।।

क्या   सुनाऊँ   मैं   बात   रातों  की ।
वो    कोई     माहताब     है   यारों ।।

आज    बादल   जमीं    पे   बरसेंगे ।
तिश्नगी      बेहिसाब      है      यारों ।।

जिस से  मिलने गए थे महफ़िल  में ।
वह      मेरा     इंतखाब    है  यारों ।।

                   ---नवीन मणि त्रिपाठी
                 मौलिक अप्रकाशित 
























रविवार, 16 अप्रैल 2017

ग़ज़ल -उसके आँचल उड़ा नहीँ करते

2122 1212 22

बेसबब   वह   वफ़ा  नहीं  करते ।
खत  मुझे यूँ  तलिखा नहीं करते ।।

है  मुहब्बत   से   वास्ता    कोई ।
उसके आँचल उड़ा  नहीँ करते ।।

लूट  जाते  हैं  जो  मेरे  घर  को ।
गैर  वह  भी  हुआ  नहीं  करते ।।

बात  कुछ  तो   जरूर  है  वर्ना ।
तुम  हक़ीक़त  कहा नही करते ।।

न्याय  बिकता  है इस ज़माने में ।
बिन  लिए  फैसला  नही करते ।।

वह गवाही भी बिक गई कब की ।
अब  भरोसा  किया नही करते ।।

जश्न  लिखता  हयात को बन्दा ।
जिंदगी  से  डरा  नहीँ   करते ।।
  
है भरोसा  जिन्हें  यहां  खुद  पर ।
वह खुदा से   दुआ  नहीं करते ।।
                   
थोड़ी   तहज़ीब   भी  जरूरी  है ।
महफिलों  से  उठा नहीं  करते ।।

और   चेहरा   खराब  होता   है ।
दाग ऐसे   धुला  नहीं   करते ।।

पूछिये  रात  माजरा  क्या  था ।
यूँ ही काजल  बहा नहीं करते ।। 

टूट  जाये  कहीं   न्  दिल  कोई।
इस तरह ख़त लिखा नहीं करते ।। 

कुछ तो अय्याशियां  रहीं   होंगी ।
नाम  यूँ  ही  मिटा  नहीं  करते ।। 

है  खुमारी   तमाम  चेहरे  पर ।
कौन कहता नशा नहीं करते ।। 

जो हिफ़ाज़त में हुस्न रखते हैं ।
रहजनों  से  लुटा  नहीं करते ।। 

              --नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -- हो सके मुस्कुरा दीजिये

212 212 212 
चाहतों   का  सिला   दीजिये ।
हो   सके   मुस्कुरा    दीजिये ।।

टूट     जाए   न्   ये   जिंदगी।
हौसला   कुछ  बढा   दीजिये।।

गफलतें   हो   चुकी  हैं  बहुत ।
रुख़   से  पर्दा  हटा    दीजिये ।।

देखिए    हाल    बेहाल     क्यूँ ।
आप  ही   कुछ   दवा  दीजिये ।।

बेवफा  कह   दिया   क्यो उसे ।
राज   है  क्या   बता   दीजिये ।।

लूट  कर  ले  गई  सब   नजर ।
यह रपट  भी  लिखा  दीजिये ।।

टूटकर  वह   बिखर  ही   गई ।
जाइये   घर    बसा    दीजिये ।।

है    जरूरी    मुलाकात   भी ।
रास्ता    इक   बना   दीजिये ।।

दीजिये  जाम   उसको   मगर ।
थोड़ा    पानी   मिला  दीजिये ।।

जो  हुई   थी  ग़ज़ल  याद  में ।
आज फिर वह  सुना दीजिये ।।

वह  बहुत  कह  चुका  है बुरा ।
आइना  अब  दिखा  दीजिये ।।

उम्र   कातिल   हुई   आपकी ।
तीर    सारे    चला   दीजिये ।।

नींद   आती   नहीं   रात  भर ।
ख़त   पुराने   जला   दीजिये ।।

          --नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -मैकदों के पास आकर देखिये

2122 2122 212 

मैकदों  के   पास  आकर   देखिये ।
तिश्नगी  थोड़ी   बढ़ाकर   देखिये ।।

वह नई उल्फ़त या नागन है  कोई ।
गौर से  चिलमन  हटाकर देखिये ।।

सर  फरोशी  की  तमन्ना  है  अगर ।
बेवफा  से   दिल लगाकर देखिये ।।

आपकी जुल्फें सवंर  जायेगी  खुद ।
आशिकों  के  पास  जाकर देखिये ।।

आस्तीनों    में   सपोले    हैं    छुपे ।
हाथ  दुश्मन  से  मिलाकर  देखिये ।।

जल न् जाऊँ मैं कहीं फिर इश्क़ में ।               इस तरह  मत  मुस्कुराकर देखिये ।।
                       
होश  खोने   का   इरादा   है  अगर ।
ज़ाम साकी को  पिलाकर  देखिये ।।

दाग लग  जाते हैं दामन  पर  यहां ।
कुछ  तमाशा  दूर   जाकर  देखिये ।।

फिर नशेमन पर गिरी हैं बिजलियाँ ।
बादलों  को  तिलमिलाकर देखिये ।।

हो रहा वह  हुस्न भी  नीलाम  अब ।
बोलियां  ऊंची   लगाकर  देखिये ।।

चाहते   गर  लाश  जिन्दा  देखना ।
रात  कोठों  पर   बिताकर  देखिये ।।

            --नवीन मणि त्रिपठी

आ गया है फिर सिकन्दर देखिए

2122 2122 212

आ गया  है फिर  सिकन्दर  देखिये ।
हारते  पोरस   का   मंजर   देखिये ।।

लुट रही थी आबरू सड़को पे तब ।
रोमियों को  अब बुलाकर  देखिये ।।

गाँव  जीता  था  अंधेरों   में  कभी।
रौशनी   है  गाँव   जाकर  देखिये ।।

सब  मवाली  भाग कर  जाने  लगे ।
अब चमन में सर  उठाकर  देखिये ।।

बच   रहे   मासूम  कटने  से  यहाँ ।
पाप  का  घटता  समंदर   देखिये ।।

बन्द  होगी  वह  वसूली  इस तरह।
दिख रही खाकी में अंतर   देखिये ।।

खूब  सी  ऍम ओ  मरे  थे  लूट  में ।
जां   बचाते  आज   रहबर  देखिये ।।

हाथियों ने खा लिया  गैरों  का हक़।
पेट में  क्या  क्या  है अंदर देखिये ।।

आ  रहे  उम्मीद  से   मिलने   बहुत ।
चोर  के  बचने  का ऑफर  देखिये ।।

थी वो अय्यासी   में  डूबी  सल्तनत ।
हुक्मरां  का   सर  मुड़ाकर  देखिये ।।

ख़ास   मजहब  से  लुटी  है  औरतें ।
दीजिये हक़  फिर  मुकद्दर  देखिये ।।

             --नवीन मणि त्रिपाठी

तेरे दर पे न् कभी जुल्म का साया जाए

2122 1122 1122 22 
अब  दुवाओं  के  लिए  हाथ  उठाया  जाए 
तेरे दर पे न् कभी  जुल्म का  साया  जाए ।।

हुस्न   मगरूर  हुआ   है  ये  सही   है  यारों ।
आइना उसको  न् अब  और दिखाया  जाए ।।

होश खोना भी जरूरी है  मुहब्बत के लिए ।
सुर्ख  होठों  पे  कोई  जाम  सजाया  जाए ।।

पूछ  मत  दर्द से  रिश्तों  की  कहानी  मेरी ।
ज़ह्र  देना  है  तो  बेख़ौफ़  पिलाया  जाए ।।

एक हसरत के लिए जिद भी कहाँ है वाजिब ।
गैर चेहरों को चलो  दिल  में बसाया  जाए ।।

बिक गई आज निशानी भी जो तुमने दी थी।
आखिरी  रात  है  क्या  दांव  लगाया  जाए ।।

इस से पहले वो बदल जाए न् वादा करके ।
कोई  चर्चा   न्  सरेआम  चलाया    जाए ।।

वह  उतारा  है  नया  चाँद  ज़मी  पर  देखो ।
ख़ास   इल्ज़ाम   मुकद्दर  से  हटाया  जाए ।।

इक ज़माने से अना की  है नुमाइश काफ़ी ।
नाज़नीनों  का  ये  पर्दा भी  उठाया  जाए ।।

                        --नवीन मणि त्रिपाठी

रंग बदलते रुख़सारों से क्या लेना

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 रंग  बदलते   रुख़सारों    से   क्या   लेना ।
 रोज  मुकरते   किरदारों   से  क्या   लेना ।।

गंगा    को    मैली    करती    हैं    सरकारें ।
 मुल्क  में फैले  मक्कारों    से   क्या   लेना ।।

ख़ूब  कफ़स  का जीवन  जिसको भाया है ।
उस  पंछी  को  अधिकारों  से  क्या लेना ।।

जंतर  मंतर   पर  बैठा  वह  अनसन   में ।
राजा  को   अब  लाचारों  से  क्या  लेना ।।

टूट चुका  है  उसका  अंतर  मन  जब  से ।
जग  में  दिखते  मनुहारों  से  क्या   लेना ।।

                  
फुटपाथों  पर  जिस्म बिक रहा खबरों में ।   
उसको  छपते  अखबारों  से  क्या  लेना ।।

काम  न्  आए   नेता  जो  भी   मौके   पर ।
हमको  उसके  आभारों   से   क्या   लेना ।।

दफ़्न  हुए  भौरे   पंखुड़ियों  में  फंस कर ।
फूलों  को  इन   बेचारों  से   क्या   लेना ।।

परिणामों   पर   खूब  हुई   चर्चा     देखो ।   
इस  चर्चा   पर  गद्दारों   से   क्या   लेना ।। 

सच को ही मै  सच  कहता  हूं महफ़िल में ।
कान  लगे   इन  दीवारों   से  क्या   लेना ।।

हो न् सका जो बाप का वो जनता का  कब ।
राजनीति    के   खुद्दारों   से   क्या   लेना ।।

           -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल हम प्यार निभाने आए हैं

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कुछ  वक्त  खुदा  से माँगा  है  
जीने    के   बहाने   आए  हैं ।
हम   प्यार   निभाने  वाले  हैं 
हम  प्यार   निभाने  आए  हैं ।।

बदनाम न् कर दे  फिर कोई  
है पाक मुहब्बत  पर  पहरा ।
दुश्मन  हैं  बडे मगरूर  यहां  
तहज़ीब  सिखाने  आए  हैं ।।

चेहरे  पे  लटकती  हैं जुल्फें 
आँखों  में शरारत  होती  है ।
जो जख़्म सलामत हैं तुझसे 
वह जख्म  दिखाने  आए हैं ।।

आबाद   है  ये  गुलशन  तेरा 
आबाद   मिला   है  मैखाना ।
हैं   रिन्द  बहुत  प्यासे  प्यासे  
अब  ज़ाम  उठाने  आए   हैं ।।

ऐतबार  मुझे  भी  था तुझपर 
पर  यार  भरोसा   टूट  गया ।
जो  राज  छुपाया  था  तुमने  
वह   राज  बताने   आए   हैं ।।

ये   गर्म   हवाएं   साँसों    की , 
शम्मा को जला कर रख देंगी ।
हसरत  है  गजब परवानो  की 
वो   जान   गवाँने   आए   हैं ।।

है नाज़  तुझे  गर  हुस्न पे तो 
इतनी सी अना भी जायज है ।
बाज़ार    समझ कर   दीवाने  
क्यों   दाम   लगाने  आए हैं ।।

मैं  याद    तुझे   भी    आऊंगा  
इक  रात का  मेहमाँ  था  तेरा ।
ग़ज़लों के शबब गीतों का महक 
हम   छोड़   तराने   आए   हैं ।।

मशहूर   हुए   हैं  दर्दो    सितम 
मशहूर   हुआ   दीवाना    पन ।
ऐ  इश्क़   हिफाजत    में   तेरे  
क्या क्या वो  ज़माने  आए  हैं ।।

                ---नवीन मणि त्रिपाठी 


ग़ज़ल - कहीं ये नीयत फिसल न् जाए

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नई    जवानी     नई      अदाएं 
कहीं  ये नीयत फिसल न् जाए ।।
जरा  सँभालो   अदब  में  पल्लू 
कोई  इरादा  बदल  न्    जाए ।।

कबूल   कर   ले   सलाम   मेरा 
ऐ  हुस्न  वाले  तुझे  है  सज़दा ।
मेरी  मुहब्बत  का  दौर  यूं   ही 
तेरी  ख़ता से निकल  न्  जाए ।।

बड़ी  तमन्ना  थी  महफ़िलो  की 
ग़ज़ल  में  उसके  पयाम   होगा ।
उधर  है   दरिया  में   बेरुखी  तो 
इधर  समंदर  मचल  न्   जाए ।।

है  क़त्ल   का  गर   तेरा   इरादा 
तो  दर्द  देकर  गुनाह  मत  कर ।
हराम      होगा  ये   इश्क़     तेरा 
ख़ुदा के घर तक दखल न् जाए ।।

अगर ज़मीं  में  है   तिश्नगी  कुछ 
तो   बादलों   पर  यकीन  रखना ।
तेरी     बेसब्री    बड़ी   जुदा    है 
तमाम ख्वाहिश निगल  न् जाए ।।

ये   गर्म    झोंके    बता    रहे   हैं  
वो आग अब  तक  बुझी  नहीं है ।
खुदा  से   इतनी   सी  इल्तज़ा  है 
वो मोम का  घर  पिघल न्  जाए ।। 

न्    राज   पूछो    मेरी    जुबाँ   से 
मेरी     मुहब्वत    तबाह    होगी ।।
मैं   जख़्म  अपना   छुपा  गया  हूँ  
ये   दिल  तुम्हारा  दहल  न् जाए ।।

                 --नवीन मणि त्रिपाठी

मंगलवार, 28 मार्च 2017

अइसे सीना उतान थोरै है

एक अवधी ग़ज़ल लिखने का प्रयास                 2122 1212 22

कोई   पक्का   मकान  थोरै   है ।
दिन दशा  कुछ ठिकान थोरै  है ।।

सिर्फ  कुर्सी  मा जान  है अटकी ।
ऊ  दलित  का   मुहान  थोरै  है ।।

ई वी ऍम में  कहाँ   घुसे   हाथी।
छोटा  मोटा   निशान  थोरै   है।।

रोज  घुड़की  है देत ऐटम  का ।
तुमसे   जनता   डेरान  थोरै  है ।।

लै लिहिस कर्ज पर नया टक्टर।
कौनो  गन्ना   बिकान  थोरै   है ।।

वोट खातिर पड़ा हैं चक्कर मा ।
हमरे  खातिर  हितान  थोरै   हैं ।।

रोज  दाउद  पकड़ि रहे तुम तो।
कौनो  घर  मा लुकान  थोरै  है।।

नोट  बन्दी  पे  है  बड़ा   हल्ला ।
एको    रुपया   हेरान  थोरै   है।।

है  कसाई   पे  अब  नज़र   टेढ़ी।
राह  तनिको   भुलान  थोरै   है ।।

अब  तो  सारा  हिसाब  हो  जाई ।
तुम से  अफसर  दबान  थोरै   है ।।

है  बड़े  काम  का  छोटका योगी।
अइसे   सीना   उतान   थोरै   है ।।

             --नवीन मणि त्रिपाठी

चाँद बहुत शर्मीला होगा

चाँद    बहुत   शर्मीला   होगा ।             
थोड़ा     रंग    रगीला    होगा ।।

 यादों   में  क्यों   नींद  उडी है।         
 कोई   छैल   छबीला   होगा ।।

रेतों   पर   जो शब्द  लिखे  थे ।
डूब   गया   वह   टीला  होगा ।।

ख़ास अदा  पर  मिटने  वालों ।
पथ   आगे    पथरीला   होगा ।।

 जिसने  हुस्न  बचाकर  रक्खा ।                                  हाथ   उसी  का   पीला  होगा ।।

ज़ख़्मी  जाने  कितने  दिल हैं ।
ख़ंजर  बहुत  नुकीला  होगा ।।

मत  उसको  मासूम्  समझना ।
दिलवर  बहुत  हठीला  होगा ।।

 बिछड़ेंगे   जीवन    के   साथी।      
गठबंधन   गर    ढीला   होगा ।।

होश बचाकर  नज़र  मिलाना ।
चेहरा   बड़ा   नशीला   होगा ।।

 ऐ  प्यासे  मत  प्यास  बुझाना ।
यह  पनघट   जहरीला   होगा ।।

22 22 22 22 

           -- नवीन  मणि त्रिपाठी