तीखी कलम से

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

शनिवार, 9 मई 2015

जनाब मत पूछो

----***ग़ज़ल***---

उसका चेहरा है क्यूँ उतरा जनाब  मत पूछो।
लगा  है  हुश्न  पर  पहरा  जनाब  मत पूछो ।।

मुद्दई  और   गवाहों   की   जरुरत  क्या  थी ।
फिर  वो पेशी  से है मुकरा  जनाब मत पूछो।।

हम इंकलाब ए  मुहब्बत  की  खबर  लाये थे।
हो  गया  मुल्क  का  सहरा जनाब  मत पूछो ।।

इस  रियासत की ईट में  है फना की फितरत।
कैसे  झंडा  यहां  फहरा  जनाब  मत  पूछो ।।

हूर  ए  चिलमन  के उठाने  से  कहर बरपा  है।
जमी  से  चाँद  है  गुजरा   जनाब  मत  पूछो ।।

आलिमो  ने  यहाँ  दरियाफ्त  गुफ्त  गूँ  कर ली।
खतो  के  दर्द   का  मिसरा   जनाब   मत  पूछो।।

मुद्दतों  बाद  आशियाँ भी मिल  गया  दिल  में ।
रास्ता  क्यूँ   हुआ   सकरा  जनाब  मत  पूछो।।

सियाह शब्  में  इन्तजार  ए जख्म का मंजर।
फिर   मुकम्मल  यहाँ  ठहरा  जनाब मत पूछो ।।

सिलवटें  फिर  शिनाख्त  कर गयीं  बेचैनी की।
क्यों  गिरा  जुल्फ  से गजरा जनाब मत पूछो।।

           -नवीन मणि त्रिपाठी

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस उत्कृष्ठ कृति का उल्लेख सोमवार की आज की चर्चा, "क्यों गूगल+ पृष्ठ पर दिखे एक ही रचना कई बार (अ-३ / १९७२, चर्चामंच)" पर भी किया गया है. सूचनार्थ.
    ~ अनूषा
    http://charchamanch.blogspot.in/2015/05/blog-post.html

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