तीखी कलम से

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

ऐ खुदा कातिल तेरी मजहब परस्ती हो गयी है

                 गजल (इराक त्रासदी)

जिन्दगी  महँगी  यहाँ  पर  मौत  सस्ती   हो   गयी   है ।
जल   रही  इंसानियत  बदनाम   बस्ती  हो   गयी  है ।।

ये नबाबों  का  शहर भी  लाश  का  इक  ढेर है  अब ।
मिट  रहा   है  ये चमन  बरबाद  हस्ती  हो   गयी  है ।।

खुश  हैं   सौदागर   बहुत  शातिर   इरादों  को  लिए ।
असलहो  को  बेच  कर उनकी भी  मस्ती हो गयी है ।।

खून   की  नदियाँ   बहाना  बन   चुका   तहजीब  है ।
इस रियासत की  यहाँ  हालत भी  खस्ती  हो गयी है ।।

छिप  रहे   मासूम  अपनी  माँ  के  आँचल  में   यहाँ ।
शायद दहशतगर्द  की  गलियों  में  गश्ती  हो गयी है ।।

हर  तरफ   खामोसियाँ  हैं   मौत   की  आहट   बहुत ।
हर जुबाँ  के  लफ्ज   पर  बे  वक्त  शख्ती हो  गयी है ।।

डूबना    मुमकिन   बहुत   है  जंग   की    मजधार  में।
देख  जरजर   ये   पुरानी   तेरी   कश्ती  हो  गयी  है ।।

अब    तुझे    सिजदा   करे   कैसे    यहाँ    इंसानियत ।
ऐ  खुदा   कातिल   तेरी  मजहब परस्ती  हो  गयी है ।।

 .................नवीन..................

16 टिप्‍पणियां:

  1. खुश हैं सौदागर बहुत शातिर इरादों को लिए ।
    असलहो को बेच कर उनकी भी मस्ती हो गयी है ।।
    बेहद गहनता से सशक्‍त भावों को शब्‍द दिये हैं आपने ......बेहतरीन प्रस्‍तुति

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  2. खुश हैं सौदागर बहुत शातिर इरादों को लिए ।
    असलहो को बेच कर उनकी भी मस्ती हो गयी है ..
    लाजवाब ... आज के माहोल को लिखा है बाखूबी इन शेरों में ...

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  3. अब तुझे सिजदा करे कैसे यहाँ इंसानियत ।
    ऐ खुदा कातिल तेरी मजहब परस्ती हो गयी है ।।
    ...वाह...बहुत सटीक और सशक्त अभिव्यक्ति...

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  4. क्या खूब फ़रमाया आपने ............बहुत बढ़िया!

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज गुरुवार १० जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- राम-रहीम के आगे जहाँ और भी हैं – ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार!

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  6. आपकी इस रचना का लिंक कल दिनांक - ११ . ७ . २०१४ को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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