तीखी कलम से

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

रविवार, 16 सितंबर 2012

हिंदी का सम्मान ना काटो

                                    14 सितम्बर हिंदी दिवस पर 


हिंदी का सम्मान ना काटो|
मेरा   हिंदुस्तान ना  बाँटो ||


                    तुम भारत के जन नायक हो |
                 जन गन मन अधिनायक हो |
                 इस  लोक तंत्र के दायक  हो |
                 जन मानस के  निर्णायक हो |


 

लोकतंत्र  के  इस उपवन से ,

भाषाओँ की डाल ना छांटो ||
हिंदी का सम्मान ना  काटो
मेरा  हिंदुस्तान  ना  बाँटो ||


                   यह    देश   टूटता  जायेगा | 
                 अपराध  बोध   हो जायेगा  |
                 माथे  कलंक  लग  जायेगा | 
                 इतिहास  शर्म   दोहराएगा | 


 

तुच्छ स्वार्थ के खातिर जग में

तीखा   तीखा  विष  ना  चाटो|| 
हिंदी  का  सम्मान  ना   काटो
मेरा   हिंदुस्तान   ना    बाँटो ||


              कलुषित  क्षेत्रवाद    को  धोना | 
            बीज    राष्ट्र   वाद   के   बोना  |
            दूर  रखो   हर   कर्म  घिनौना |
            हर  भाषा   का   पुष्प  पिरोना |  


 


भारत  माँ  का  माल्यार्पण  कर 

मन के  कुटिल  राग  को  डाटों ||
हिंदी   का  सम्मान  ना   काटो |
मेरा     हिंदुस्तान  ना     बाँटो ||


                          हर  भाषा   के  बलिदानी  थे |
                       वे   स्वतंत्रता   के    दानी  थे |
                       भारत  की  अमर  कहानी थे |
                       वे   दुर्लभ   राष्ट्र   निशानी  थे |


 

बहुत   बनाई   गहरी   खाई |

शर्म  करो  जाओ  तुम पाटो ||
हिंदी  का  सम्मान ना काटो |
मेरा   हिंदुस्तान   ना   बाटो ||
                       


16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया.....
    फले फूले खिलखिलाए हमारी हिंदी....

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत उन्नत भाव बेहतरीन कविता हिंदी दिवस की बधाइयां

    उत्तर देंहटाएं
  3. namaskaar naveen ji waah bahut hi sundar shabdo se aapne hindi ka maan badhaya , umda prastuti ,badhai

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह!
    आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को आज दिनांक 17-09-2012 को ट्रैफिक सिग्नल सी ज़िन्दगी : सोमवारीय चर्चामंच-1005 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं

  5. इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर भी पधारें , आभारी होऊंगा.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति , बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग "प्रेम सरोवर" पर पधारकर मुझे प्रोत्साहित करें। धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. देश तो इन भाषाओं में कब का बट चुका है आज किसी से यदि भूले से भी अपने उसकी मातृ भाषा पूछली तो उसका जवाब सबसे वही आएगा जिस प्रांत को वो व्यक्ति हो मगर कोई भी सबसे पहले खुद को एक भारतीय मानकर हिन्दी को अपनी मातृ भाषा पहले नहीं बतायेगा लेकिन आज आपने हमारी हिन्दी के प्रति अपने प्रेम भाव को यहाँ बहुत ही खूबसूरती के साथ सजाया है आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहतर भाव पिरोये हैं इस रचना में ...!

    उत्तर देंहटाएं
  9. ........ कविता हिंदी दिवस की बधाइयां!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. हिन्दी का दर्जा दिन ब दिन कम होता जा रहा है , सरकार की उदासिनता का नतीजा है ।
    शानदार लेखन ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत अछि कविता त्रिपाठी जी.

    उत्तर देंहटाएं