तीखी कलम से

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

आम आदमी

 आम आदमी 
                      -नवीन मणि त्रिपाठी 
भारतीय अर्थ व्यवस्था में
बढ़ती महँगाई ।
भ्रष्टाचार से
काले धन की कमाई ।
वह पिस जाता है ,
घिस जाता है ,
पथराई सी आँखे ,
किसी सूखे लहसुन की कली की तरह ।
निस्तेज हो जाती हैं ।
थाली से रोटियां निकल जाती हैं ।
वह चिल्लाता है ....
रोता है ....
न्याय मांगता है ।
कौन सुनता है ?
आखिर कौन है वह ?
यही है देश का भोला भला इंशान ।
भीड़ जुटाने का सामान ।
पहचाना ?
क्या
यही है आम आदमी ?
यही है आम आदमी ??


* * * *


आम आदमी कौन है ?
वह आश्चर्य जनक ढंग से
 क्यों मौन है ?
इस गूढ़ प्रश्न का जबाब कौन दे सकता है ?
गाँव वालों ने
चार व्यवस्था के महत्वपूर्ण कर्णधारो  को बुलाया ।
सब के सामने प्रश्न  दोहराया  ।
पहले कर्णधार ने बताया ।
सबको समझाया
कहा !
आम आदमी को हम
मैंगो पीपुल कहते हैं ।
जिस तरह से आम को
आखिरी स्वाद तक पंजे से  निचोड़ते और चूसते हैं ।
ठीक ऐसे ही हम इसे निचोड़ते हैं ।
इस आम का रस हर क्षेत्र में मिलता  है ।
खेल हो या स्पेक्ट्रम
सब में दिखता है ।
जमीन के मामले में तो यह खास है ।
विकलांगो का ट्रस्ट हो या कोयला ।
सब में मिठास है ।
ऐसा आदमी जो बिना किसी आवाज के,
पीड़ा को सहता रहे  ।
अपने ही वतन में चुप चाप लुटता रहे ।
जिसके सर उठाने  के लिए
ना हो आसमान ।
और बस जाने के लिए न हो जमी ।
हाँ
वही  है आम आदमी ।
वही  है आम आदमी ।।


*                   *                    *                    *             *


दूसरे कर्णधार को नहीं रहा गया ।

पहले की बातों  में उलझ गया ।
झट से बोल पड़ा
"तुम्हारी आम आदमी के बारे में जानकारी अधूरी है ।
क्या मुझे अपनी बात कहने की मंजूरी है ?
सहमति है ! तो सुनो .....
आम आदमी का आधार जाति होता है ।
मनुवादी संस्कृति का विरोधी होता है ।
जिसे आसानी से जाति के आधार पर
बेवकूफ बनाया जाता  है ।
जातिवादी विष बीज से जिसे  भड़काया जाता है ।
उत्थान के झूठे आश्वासनों से बहकाया जाता है ।
जिसके पैसों से मूर्तियाँ और पार्क बनते हैं ।
खाद्यानो के घोटालों से बंगले सजाते हैं ।
जब वह  किसी अस्पताल की चौखट पर
बच्चे की जिन्दगी बचाने  के लिए
जान की भीख मागता है ।
अपने हिस्से की इलाज की दवा के लिए
डाक्टरों का मुह ताकता है ।
इंसान मर जाता है इलाज के बिना
नेता दवा पी जाता है शर्म लाज के बिना ।
जब वह शोर मचाता है ।
आँका के हाथी से रौंद दिया जाता है ।
दिखती  रहती है उसकी आँखों में ,
छले जाने की नमी ।
जी हाँ ,
यही है आम आदमी ।
यही हैं आम आदमी ।।



*                          *                          *                  *



तीसरे कर्णधार ने बात काटी
तोड़ दी सारी परिपाटी
चुप रह ! तुझे क्या पता ?
मूर्खता की पहचान ना जता ।
आम आदमी वह होता है ,
जो गुंडों के आतंक से आतंकित होता है ।
गुंडा टैक्स देता है ।
साम्प्रदायिकता के दंस का शिकार  होता है ।
शोषित मानसिकता से
बीमार होता है ।
वह बहुत भोला होता है ।
साम्प्रदायिक दंगो का गोला होता है ।
जैसा चाहो वैसा समझा दो ,
पूरे शहर में दंगे भड़का लो ,
बस थोड़ी सी स्कूल की फीस और
भत्तों का लाली  पाप ।
पूरा  हो जाता है
आम आदमी का ख्वाब ।
भ्रष्टाचार करते जाओ
उसे सड़क  बिजली और
पानी से तरसाओ ।
इसके बाद भी वह तुम्हारे सायकल की तीलियों को
अशोक चक्र की तीलियाँ समझने  लगे
तुम्हारी लाल टोपी के खतरनाक संकेत को
जिन्दगी की गाड़ी का ग्रीन  सिग्नल समझने  लगे ।
जब उसे जलाकर खाक करने लगे
दहकती आग मजहबी ।
बस समझ लेना 
यही है आम आदमी ।
यही है आम आदमी ।।


*                        *                     *                            *




चौथे साहब थोडा मुस्कराए
अपने आडम्बर का जाल  बिछाए
और फिर धड़ल्ले से उछल गये
अपनी ताकत पर मचल गये
मैं बताऊंगा !
प्रत्यक्ष दिखाऊंगा ।

अरे भाई अवैध खनन कर लो ।
देश के अधिकारीयों को
ट्रैक्टर से कुचल दो ।
ड्राइवर हो या ज्योतिषी
किसी को कम्पनी मालिक
तो किसी को डायरेक्टर बना दो ।
जब चाहो जैसे चाहो
जिन्दगी को कमल सा खिला लो ।
जमीन हथियाओ
सिचाई के पानी से फैक्ट्री  चलाओ ।
भगवन के नाम पर जीता है
मस्जिद में कुरान और मंदिर में रखता गीता है ।
धर्म के नाम पर
जो अति संवेदनशील होता है ।
राज नेताओं की नाव का कील होता है ।
जो धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक हो जाता है ।
जाति  के नाम पर जातिवादी हो जाता है
जो रोटी के नाम पर स्वाभिमानी नहीं होता
देश के नाम पर हिन्दुस्तानी नहीं होता
जिसके चरित्र की कीमत में
रह जाती है कमी
वही है आम आदमी ।
वही है आम आदमी ।।


*                    *                  *                        *


इतना सुनते ही
आम आदमी का स्वाभिमान जाग गया
चारो तरफ हाहा कार मच गया
उसका रौद्र रूप देख कर
सिंघासनों में आ गया भूचाल
सिहर गया है भ्रष्टाचारी
जो है मालोमाल ।
फिर भी
आज आम आदमी
बड़े ही तहजीब के साथ आगे आया है ।
साफगोई से कुछ कहने  आया है ।
" साहब मैं हूँ
आम आदमी
जिसे आप सब ने लूटा है ।
थाने  ले जाकर पीटा  है ।
हमारे खेतो का पानी  आप  पीते  हो
हमारी बिजली से जिन्दगी  जीते हो ।
आप ने धर्म के नाम पर
जानवर की तरह लड़ाया है ।
जाती के नाम पर आप ने आपने
चुनाव में जीत का बिगुल बजाया  है ।
आज आप की नज़रों में ये आम आदमी
कितना घिनौना हो गया है ।
यह तो गुलाम भारत से भी ज्यादा
बौना हो गया है ।
पर याद  रहे साहबान !
आम आदमी अब नहीं होगा मेहरबान ।
अब उसे अपना आत्म सम्मान चाहिए ।
एक एक  रुपयों का हिसाब चाहिए ।
देश के लुटेरों का वापस मॉल चाहिए ।
उन्हें पकड़ने का हथियार लोकपाल चाहिए ।
जब देश का आम आदमी जगता  है ।
अपना स्वाभिमान मागता है ।
खो जाती है शासकों की शांति ।
देश में आती है महाक्रान्ति ।
भ्रष्टाचारियो से देश को निजात चाहता है ।
गाँधी का देश रामराज्य चाहता है ।।
सावधान !
सत्ता के मद में चूर भ्रष्टाचारियों ।
शोषण करने वाले मत के भिखारियों ।
तुम्हारे घिनौने  कर्मों से नहीं रह गया हूँ अजनबी ।
जानो ........ !  पहचानो ......!
यही है आम आदमी
यही है आम आदमी ।।

22 टिप्‍पणियां:

  1. काश हर आम आदमी हिसाब मांग पाये .... बहुत अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. आम आदमी की परीक्षा का समय खतम होते ही पांसे पलट जायेंगे .सशक्त आलेख तीखी कलम से

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया.....
    सार्थक रचना...

    सादर
    अनु

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  4. आम आदमी का क्या हाल हो गया है, सुन्दर प्रस्तुति...

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  5. अच्छी प्रस्तुति |
    बधाई भाई जी ||

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  6. सशक्त और प्रभावशाली प्रस्तुती....

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  7. बहुत खूब,,,,सशक्त अभिव्यक्ति,,,

    आम आदमी बद से बद हाल हो गया,
    आज का नेता गुलसे गुलजार हो गया,,,,,

    RECENT POST LINK ...: विजयादशमी,,,

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  8. न्याय मांगता है ।
    कौन सुनता है ?
    आखिर कौन है वह ?
    यही है देश का भोला भला इंसान .... जो भीड़ में खो गया है

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  9. जो धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक हो जाता है ।
    जाति के नाम पर जातिवादी हो जाता है
    जो रोटी के नाम पर स्वाभिमानी नहीं होता
    देश के नाम पर हिन्दुस्तानी नहीं होता
    ....... विचारों का मंथन कर देने वाली सषक्त रचना .. बहुत खूब!

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  10. मन के अप्रतिम भावों को दर्शाती आपकी यह कविता अच्छी लगी। मेरी कामना है कि आप सर्वदा सृजनरत रहें। धन्यवाद।

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  11. बहुत ही सशक्त और प्रभावशाली प्रस्तुति....

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  12. अन्नाजी ,केजरीवाल अरविन्द ,किरण बेदी ,इतर भारत धर्मी समाज जो भ्रष्टाचार के विरोध में आ रहा है इसी आम आदमी को केंद्र में ला रहा है .साधना वैद के शब्दों में -

    अन्ना "गांधी "हो गए ,भगतसिंह अरविन्द ,

    बिगुल बज गया क्रान्ति का जागेगा अब हिन्द .

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  13. आम की तरह आम आदमी को चूसा जा रहा हे।
    अच्छी कविता।

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  14. ...बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति ...

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  15. बहुत जबरदस्त व्यंग्यात्मक पोस्ट आम आदमी का बढ़िया विश्लेषण किया अब आम आदमी ख़ास बनकर इस देश से भ्रष्टाचार रुपी राक्षस का वध करने के लिए जाग्रत हो गया है बहुत बहुत बधाई आपको

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  16. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 6/11/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है ।

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  17. बहुत जबरदस्त व्यंग्यात्मक पोस्ट आम आदमी का बढ़िया विश्लेषण किया अब आम आदमी ख़ास बनकर इस देश से भ्रष्टाचार रुपी राक्षस का वध करने के लिए जाग्रत हो गया है बहुत बहुत बधाई आपको

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  18. बेहद सशक्‍त लेखन ... आभार

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  19. आम आदमी पिस रहा, मजे कर रहे खास।
    मँगाई की मार से, मेला हुआ उदास।।

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  20. बहुत सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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