तीखी कलम से

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

पल दो पल के मीत वेदना क्या समझेंगे

वे  अंतस   की  पीर   चेतना   क्या  समझेंगे ।
पल  दो  पल  के  मीत  वेदना  क्या  समझेंगे।।

सागर  के अंतर में  जब हो अग्नि प्रज्ज्वलित।
मेघों  को  मधुमास  करे जब  भी  आमन्त्रित।।
जब धरती  भी गहन तपन से अति अकुलाए ।
जब  पुष्पों  की  गन्ध  भ्रमर को मद में लाए ।।

फिर  नयनो  से   तीर  भेदना  क्या   समझेंगे।
पल दो  पल  के मीत  वेदना  क्या   समझेंगे ।।

पगडण्डी  पर  पथिक भटकता रोज  यहाँ  है।
सुखमय  मायावी  अवनी  की  खोज  यहां है।।
नित  चिरायु का  राज  ढूढ़ने  चला  मुसाफिर।
विमुख  हो  गया  जीवन उत्सव जीने खातिर।।

प्रेम   राग   का   गान   छेड़ना  क्या  समझेंगे ।
पल  दो  पल  के  मीत  वेदना  क्या  समझेंगे ।।

पंखहीन   पंछी    है   मत   अभिलाषा   पूछो।
अंतहीन  इच्छा   की   मत   परिभाषा   पूछो।।
तरुणाई  अब   बिक   जाती  चौराहो   पर  है।
फिर  सौंदर्य  परखा  जाता  श्रृंगारों   पर   है।।

वे  नैनो   की   रीत    देखना   क्या  समझेंगे।
पल  दो  पल  के  मीत  वेदना  क्या समझेंगे ।।

मनुहारों   का   वेग   स्वप्न   को  तोड़  गया है ।
अनुरागों  का   प्रश्न   हवा  को  मोड़  गया है।।
बन प्रस्तर  की  मूर्ति  निरंतर  पस्त  पड़ा   हूँ।
गरल  हो  गयी  चाह निरूत्तर  मौन  खड़ा हूँ।।

वे  अलकों   पर  हाथ  फेरना  क्या  समझेंगे।
पल  दो  पल के मीत  वेदना  क्या  समझेंगे ।।

          -नवीन मणि त्रिपाठी

5 टिप्‍पणियां:

  1. very well written . hats off to u .. plz do visit ::
    Acid :: Dilute or Concentrated ????? ( ब्लॉग ) :: http://swapnilsaundaryaezine.blogspot.in/2015/03/acid-dilute-or-concentrated.html

    and

    स्वप्निल सौंदर्य ई-ज़ीन ( ब्लॉग ) :: http://swapnilsaundaryaezine.blogspot.in/2015/03/swapnil-saundarya-e-zine-vol-02-issue_25.html

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीया स्वप्निल शुक्ला जी आभार
      fb pr
      naveentripathi35@gmail.com pr aapki prteeksha rahegi

      हटाएं
    2. आदरणीया स्वप्निल शुक्ला जी आभार
      fb pr
      naveentripathi35@gmail.com pr aapki prteeksha rahegi

      हटाएं
  2. हृदय स्पर्शी विरह रचना...!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीया कुमकुम त्रिपाठी जी सादर आभार
      fb pr naveentripathi35@gmail.com pr aapki prteeksha rahegi

      हटाएं