तीखी कलम से

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

रविवार, 25 जनवरी 2015

वतन के नाम कुछ मुक्तक


***  वतन के नाम (मुक्तक)***

नमन  है  उन  शहीदों  को  जो  भारत की  निशानी हैं।
गुलामी  से  लड़ी   हर   जंग  की  पावन  कहानी  हैं ।। 
तिरंगे  में   लिपट  फांसी  का  फंदा   चूम  कर  झूले ।
वतन  की  आबरू   खातिर  मिटी  जो  जिंदगानी है।।

मजहबों  से   तिरंगे  का  ये  मजहब  है  बहुत  ऊंचा।
हुआ है सर कलम उसका जो आजादी  बहुत  पूजा ।।
वो हिन्दू  थे  मूसलमा थे वो  सिख थे  वो  ईसाई  थे ।
सभी  मजहब  से  बंदे  मातरम का स्वर बहुत गूंजा ।।

शरहदों  पर  लहू अब ,जब भी  तुम  मेरा  बहाओगे।
हरकतें  गर  हुई  तुमसे ,तो  कीमत भी  चुकाओगे ।।
जमाने  भूल  जाना  वो, सियासत  सख्त   है  मेरी ।
बरस  जायेंगी   बारूदें,  जिसे   ना   भूल  पाओगे ।।

बहुत तौलो नहीं अब तुम ,तिरंगे  की  सराफत  को।
शहीदों  ने  लिखी  अपने   लहू  से इस इबारत को ।।
हिन्द  की  शान में  अक्सर  यहाँ जलती चिताएं हैं।
ये  चिंगारी  जला  देगी  दहशतों  की  इमारत  को ।।

जियेंगे  देश   की  खातिर , मरेंगे  देश   की  खातिर।
हौसले   ढूढ़   लायेंगे   नए   परिवेश   की   खातिर ।।
ये  कुर्बानी   शहीदों  की,  निशानी  में    तिरंगा   है ।
जली  हैं  ये मसालें  फिर  इसी  सन्देश की खातिर।।

ऐ  ड्रेगन  डूब मर  तू  जा ,किसी चुल्लू के  पानी में ।
बना चूहा  कुतरता ,शरहदों  को  किस   गुमानी  में ।।
ये  शेरो  की जमी  है भाग कर  जाना तेरा मुश्किल ।
कैद  कर  लेंगे  दो  पल  में  तुम्हें  हम  चूहेदानी   में ।।

तेरे  मकसद  पे  पानी  फेरना अब आ गया  हमको ।
ईट  पर  पत्थरों का  फेकना भी  आ  गया  हमको ।।
अमन  के  दुश्मनों अब  हम  बता देंगे  तेरी जद को ।
तेरी मंजिल पे तुझको भेजना अब  आ गया  हमको।।

                                 -- नवीन मणि त्रिपाठी

2 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण रचना ............बधाई! गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।

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  2. सुन्दर शब्द रचना ..... हर शब्द मोती हैं आपका पहली बार आया हूँ आपके ब्लाँग पर
    http://savanxxx.blogspot.in

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