तीखी कलम से

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

शनिवार, 19 मार्च 2016

उसकी ठहरी जबान तक चलिए

ग़जल की   दास्तान   तक  चलिए ।
थोड़ी  लम्बी  उड़ान  तक  चलिए ।।

इस  बुलन्दी  में कुछ  नहीं हासिल।
वक्त की  हर  ढलान  तक   चलिए।।

हया में  कुछ  न  कह सकी मुझसे ।
उसकी  ठहरी  जबान  तक चलिए ।।

धुएं   में   फ़िक्र   गर    उड़ाना   है ।
चिलम  वाली  दुकान तक  चलिए ।।

कुछ  तकल्लुफ  से  खौफ बरपा है ।
मैकदो   मे   ईमान   तक   चलिए ।।

देखनी  गर  तुझे  तासीर  ए  लहर ।
नदी   में  भी  उफान  तक  चलिए ।।

साजिशें   मुल्क    तोड़   देने   की ।
दुश्मनों   के  मकान  तक  चलिए ।।

गर    मिटाने   का  हौसला  तुझमे ।
तो  यहां  खानदान   तक   चलिए ।।

सितम   लहरों   के  रोकते  जज्बे ।
लिए  हसरत  कटान  तक  चलिए ।।

पस्त   होकर   वो   जान   देता   है ।
दर्दे  मंजर  किसान   तक   चलिए ।।

दौलत   ए   हिन्द   के   लुटेरे    जो ।
उनके  ऊंचे   मचान   तक  चलिए ।।

     --नवीन मणि त्रिपाठी

2 टिप्‍पणियां:

  1. दिल बाग़- बाग़ हो गया त्रिपाठी जी इस ग़ज़ल को पढ़कर. वाह ..क्या लिखा है.

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  2. आदरणीय रंजन साहब बहुत बहुत शुक्रिया ।

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