उम्मीदें थी मिलन में अश्क की बरसात भी होगी ।
मचलती या छलकती कुछ तेरी जज्बात भी होगी ।।
ज़माने से नही शिकवा करेगा काम वो अपना ।
यहां मेरे रकीबों की बड़ी तादात भी होगी ।।
बहारें कब कहाँ ठहरी चमन के वास्ते यारो ।
वहां तो आशिकाना ख्वाहिशें इफ़रात भी होंगी।।
न समझो दर्द के दरिया के माफिक बह रही है वो ।
जिंदगी ! हाँ तेरी किस्मत नयी सौगात भी होगी ।।
जला कर घर मुहब्बत का दिखा है फिर वो दीवाना ।
शहर को अब जलाने की कोई शुरुआत भी होगी ।।
नई शाखों पे गुल से मुस्कुरा के कह गए भौरे ।
हमारे बज्म से ज्यादा तेरी औकात भी होगी ।।
चाँद के नाज पर यूँ कह दिया है बे झिझक उसने ।
तिरे हिस्से में बाकी कुछ अंधेरी रात भी होगी ।।
हरकतें छोड़ दे तू मत दिखाना जख्म अब उसको।
चाहतॉ से खुदा की रहमतें बिन बात भी होगी ।।
---नवीन मणि त्रिपाठी
तीखी कलम से
मेरे बारे में
- Naveen Mani Tripathi
- जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन
रविवार, 28 फ़रवरी 2016
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016
बदलते ही नया मौसम ठिकाने छूट जाते हैं (ग़ज़ल)
----*********** "ग़ज़ल "***********----
( 25 शेरों से युत ग़ज़ल पहली बार )
वक्त के साथ ऐ जालिम, ज़माने छूट जाते हैं ।
मुहब्बत क्यों ख़ज़ानो से ख़ज़ाने छूट जाते हैं ।।
तजुर्बा है बहुत हर उम्र की उन दास्तानों में ।
तेरीे जद्दो जेहद में कुछ फ़साने छूट जाते हैं ।।
बहुत चुनचुन के रंजोगम को जो लिखता रहाअपना।
उन्हीं से इंतकामो में निशाने छूट जाते हैं ।।
रकीबों से मुशीबत का कहर बरपा हुआ तब से ।
हरम के घुंघरुओं से कुछ तराने छूट जाते हैं ।।
वो कुर्बानी है बेटी की जरा जज्बात से पूछो ।
नए घर को बसाने में घराने छूट जाते हैं ।।
गरीबों की खबर से है कमाई का कहाँ नाता ।
चैनलो पर कई आंसू दिखाने छूट जाते है ।।
चन्द साँसे बची हैं अब सबक के वास्ते तेरे ।
कायदे फर्ज के अक्सर बताने छूट जाते हैं ।।
मुखौटे ओढ़ के बैठे हुए जो ख़ास है दिखते ।
वही रिश्ते जो तुम् से आजमाने छूट जाते हैं ।।
यहां सावन नहीं बरसा वहां फागुन नहीं आया।
दाल रोटी में वो मौसम सुहाने छूट जाते हैं ।।
पेट की आग में झुलसे हुए इंसान से अक्सर।
जो मन के मीत थे सारे पुराने छूट जाते हैं ।।
मकाँ लाखो बना कर बेअदब सी सख्सियत जो हैं ।
इन्ही लोगों से अपने घर बनाने छूट जाते हैं ।।
परिंदों का भरोसा क्या कभी ठहरे नही हैं वो ।
बदलते ही नया मौसम ठिकाने छूट जाते हैं ।।
न औकातों से ऊपर उठ मुहब्बत जान लेवा है ।
बड़े लोगो से कुछ वादे निभाने छूट जाते हैं ।।
सियासत लाश पर करके रोटिया सेंक ली उसने ।
सियासत दां से अब मरहम लगाने छूट जाते है ।।
खुशामद कर अनाड़ी पा रहे सम्मान सत्ता से ।
ये हिन्दुस्तान है प्यारे सयाने छूट जाते हैं ।।
खुशबओ की तरह वे जो बिखर जाते फिजाओं में ।
ख़ास मेहमाँ मेरी महफ़िल बुलाने छूट जाते हैं ।।
मैंकदों में से न कर यारी इन्हें दौलत बहुत प्यारी ।
यहाँ तिश्ना लबों को मय पिलाने छूट जाते हैं ।।
अदालत में सुबूतो पर है लग जाती कोई बोली ।
यहाँ मुजरिम भी दौलत के बहाने छूट जाते हैं ।।
कातिलो के शहर में ढूढ़ ले अपनी वफादारी ।
मुहब्बत के बदौलत कत्ल खाने छूट जाते हैं ।।
बयां करके गया है खत तेरे राज ए हकीकत को ।
इश्क बाजी में तुझसे खत जलाने छूट जाते हैं ।।
कसम रंजिश में वो खाता रहा उसको मिटाने के ।
रूबरू चाँद से ख्वाहिश मिटाने छूट जाते हैं ।।
मिला है वह गले मेरे मगर खंजर छुपा करके ।
नफरतों के किले उनसे ढहाने छूट जाते हैं ।।
हवाला उम्र का देकर दरिंदे फिर बचे देखो ।
तुम्हारे शहर के ये शातिराने छूट जाते हैं ।।
वो चौराहो पे बैठी थी नकबो से अलग हटकर ।
मुकाम ए उम्र से फैशन दिखाने छूट जाते हैं ।।
ग़ज़ल की तिश्नगी है बेकरारी का सबब आलिम ।
हूर के बिन स्वरों में गुनगुनाने छूट जाते हैं ।।
--नवीन मणि त्रिपाठी
(मित्रो ग़ज़ल कम से कम 3 शेर और अधिकतम 25 शेरो तक लिखी जाती है मैंने पहली बार इतनी बड़ी ग़ज़ल लिखी है आपको कैसी लगी )
शनिवार, 30 जनवरी 2016
ग़ज़ल
मैं इबादत हसरतों के नाम ही करता रहा ।
वक्त से पहले कोई सूरज यहां ढलता रहा ।।
जिंदगी के हर अंधेरो से मैं बाजी जीत कर ।
बन मुहब्बत का दिया मैं रात भर जलता रहा ।।
रात की तन्हाइयाँ ले कर गयीं यादें तेरी ।
फिर सहर आई तो मैं यूँ हाथ को मलता रहा।।
जब से देखा रिन्द ने साकी तेरे अंदाज को ।
मैकदे में जाम का यह सिलसिला चलता रहा ।।
रात दिन सजदा मेरा होता रहा उस हुश्न को ।
जो किसी नागन की माफिक उम्र भर डंसता रहा ।।
**** नवीन
सोमवार, 11 जनवरी 2016
गैर से वक्त बिताने का पहर देख लिया
दाग दामन का छुपाने का हुनर देख लिया ।
आग सावन में लगाने का असर देख लिया ।।
बड़ी कमसिन हो हिमाकत तेरी तौबा तौबा ।
फिर क़यामत को बुलाने का जिगर देख लिया ।।
हुए हैं हुश्न के सजदे तेरी बलाओं से ।
नज़र नज़र से पिलाने का शहर देख लिया ।।
वो समंदर है मेरा डूबना भी मुमकिन था ।
तेज लहरों में समाने का कहर देख लिया ।।
मेरे सहन से वो गुजरा है अजनवी की तरह ।
उसकी आँखों में जलाने का जहर देख लिया ।।
तेरे वादों से इल्तज़ा थी मुहब्बत की उसे ।
गैर से वक्त बिताने का पहर देख लिया ।।
नवीन
गुरुवार, 7 जनवरी 2016
सियासत दां की गद्दारी ने उसको मार डाला है
------***ग़ज़ल***-----
करो तुम शौक से हमला यहाँ हाथों में ताला है ।
मेरी आदत में शामिल है मुझे गांधी ने पाला है ।।
मालदा को छुपा कर मीडिया तू फख्र कर लेकिन ।
दिखा बिकना तेरा सबको तुझे दिल से निकाला है ।।
तम्बुओं में है जो जीता वो वाशिंदा है कश्मीरी ।
किसी सरकार के साये तले लुटता निवाला है ।।
बहन बेटी को खोकर भी वतन कश्मीर वह माँगा ।
सियासत दां की गद्दारी ने उसको मार डाला है ।।
रखो भूखा ये मतदाता ,, रहें रोटी पे ही नज़रें ।
चन्द टुकड़ो पे ये सरकार चलनी पांच साला है ।।
गोलिया खा के चिल्लाना और खामोश हो जाना ।
फितरते हिन्द का जज्बा तू किस साँचे में ढाला है ।।
गुलामी दस्तकें देती , तू बस कुर्सी से चिपका रह ।
तेरे जालिम इरादों पर उजाला ही उजाला है ।।
कहो मत पीठ का इसको धँसा सीने में है खंजर ।
सराफत में मिटे इस मुल्क का निकला दीवाला है।।
चुटकियों में मसल देने का जज्बा रोज सुनता हूँ ।
नहीं क्या आब है तुझमे या तेरा दिल भी काला है ।।
--नवीन मणि त्रिपाठी
सोमवार, 28 दिसंबर 2015
तो बागी हूँ मैं अपनी जीत की तलवार लिखता हूँ
कातिलों के चमन की हर दरो दीवार लिखता हूँ ।
यहाँ नफ़रत के साये में वतन से प्यार लिखता हूँ ।।
तू मुल्के मुख़बिरी अय्याशियों के नाम कर डाला ।
जो डायन कह गया माँ को उसे गद्दार लिखता हूँ।।
हों पैरोकार दहशतगर्द के जब भी सियासत में ।
मिटाकर हस्तियां उनकी नई सरकार लिखता हूँ ।।
उखड़ती ईट सड़को पर तरक्की देख ली सबने ।
तेरे जुमलों शिगूफों का बड़ा व्यापार लिखता हूँ ।।
गले जब तुम मिले उस से तो शक बदला यकीनों में ।
भ्रष्टता का नहीं तुझको मै पहरेदार लिखता हूँ ।।
जलाकर राख करते जो अमन का हौसला अक्सर ।
कलम से मैं उन्हीं के वास्ते अंगार लिखता हूँ ।।
किसी जन्नत की माफिक सैफई में जगमगाहट है।
अंधेरों से तड़पते गाँव का अधिकार लिखता हूँ ।।
रोटियां छीन ली तुमने जेहन दारों की थाली से ।
गुनाहे सिलसिला तेरा यहाँ सौ बार लिखता हूँ ।।
बगावत है यहाँ गर सच को लिख देना किताबों में ।
तो बागी हूँ मैं अपने जीत की तलवार लिखता हूँ ।।
- नवीन मणि त्रिपाठी
पगली कुछ पहचान तो रख
थोड़ी अपनी शान तो रख ।
पगली कुछ पहचान तो रख ।।
सौदागर सब लूट रहे हैं ।
तू अपनी दूकान तो रख ।।
जेल से छूटा वही दरिंदा।
संसद का सम्मान तो रख ।।
फिर छापों पर बहस हो गयी।
बदला सा ईमान तो रख ।।
जंग खेल के मैदानों पर ।
उसका थोडा मान तो रख ।।
हुई अदालत में हाजिर वो ।
इसका भी गुणगान तो रख ।।
नज़र जमाने की है तुझपर ।
मिर्च और लोबान तो रख ।।
हक चरने आएगा नेता ।
ऊंचा एक मचान तो रख ।।
तरकस में कुछ तीर बचे हैं ।
हाथ नया संधान तो रख ।।
कायर कहकर भाग रहा है ।
अपनी सही जबान तो रख ।।
महगाई से कौन बचा है ।।
चेहरे पर मुस्कान तो रख ।।
खुदा कहाँ खोया है तुझसे ।
गीता और कुरान तो रख ।।
- नवीन मणि त्रिपाठी
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