तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

सोमवार, 29 जून 2015

पापा के नाम

पापा अब  मेरे आँसू  की तुम
और    परीक्षा    मत    लेना ।
सैलाब   उमड़ते   आँखों  में
अब  धैर्य की शिक्षा मत देना।


मैं  टूट रहा  हूँ  अब  प्रतिपल।
खो  रहा अनवरत हूँ सम्बल ।
मैं  शक्तिहीन दुःख में विलीन।
आभासित  जैसे   कर्म  हीन ।
ईश्वर  भी  हुआ  पराया  सा ।
मन  व्याकुल  है  बौराया सा ।



मैं  भीख   मांगता  प्राणों की
वह चाह  रहा  सब हर लेना ।।
पापा अब  मेरे आंसू की तुम
और   परीक्षा    मत    लेना ।।



आडम्बर   सा  ईश्वर  लगता ।
निष्तेज  हुई  जाती   क्षमता ।
जप  पूजन  सारे  व्यर्थ  लगे ।
संभावित   यहां  अनर्थ  लगे ।
सिसकियाँ रोक कर जीता हूँ।
आँसू  को  छुपकर  पीता हूँ ।



ईश्वर  ही   न्याय  विधाता  है
फिर  ऐसी  दीक्षा  मत  देना ।
पापा अब मेरे  आंसू की तुम
और   परिक्षा    मत   लेना ।।



है रोम  रोम ऋण भार  लिए ।
तुमसे  ही  जीवन सार  लिए ।
तुम  भाग्य  विधाता  हो  मेरे ।
इस  जन्म  के  दाता  हो  मेरे।
मैं शून्य विकल्पों के  संग  में ।
निश्चेतन   सा  प्रस्तर  रंग  में ।



नौका   आशा   की   डूब  रही
अब मुश्किल  बहुत इसे  खेना ।
पापा  अब  मेरे आंसू की  तुम
और     परीक्ष    मत    लेना।।



सब  दृश्य  पटल  पर घूम रहा ।
बचपन  का  दर्पण लौट  रहा ।
संघर्षो  की  वह  अमर  कथा।
देखी    मैंने    सम्पूर्ण    व्यथा।
वह आत्म शक्ति वह  संस्कार ।
है   मिला  मुझे  अद्भुद  दुलार ।



मैं बिछड़ सकूँ  न अब  तुमसे।
आशीष  मुझे  शत  शत देना ।
पापा अब  मेरे आंसू  की तुम
और   परीक्षा    मत    लेना ।।



दुर्भाग्य चरम पर बोल रहा ।
अंतस का साहस डोल रहा ।
इस अवनी में मैं बिखर रहा ।
असहाय बना मैं सिहर रहा ।
निः शब्द हुआ मैं सुलग रहा ।
हूँ मौन अंक से  विलख रहा ।



यह  तीक्ष्ण  वेदना   है  निर्मम
अभिशप्त  समीक्षा  मत  देना ।
पापा अब  मेरे आंसू  की  तुम
और    परीक्षा    मत     लेना ।।

         
                    नवीन

इन आसुओं के छलकने का न बन

ग़ज़ल

मेरे महबूब  तू   जख्मो  का तलबगार  ना  बन ।
इन आसुओं के छलकने का गुनहगार ना बन ।।

था   इन्तजार  मुझे   तेरी  उन   दुआओं  का ।
मेरे  जमीर के  हिस्से  का  खरीदार  ना  बन ।।

लूट  गया   मैं   हूँ   तेरे  हुश्न  के   मैखाने  में ।
मेरे  साकी  मेरे  नीलाम का अखबार ना बन।।

शहर  ए   दीवार  नाम   चस्पा  बेवफाई  का।
मेरी  हस्ती  को मिटाने का इस्तिहार ना बन ।।

मैं  खिजाओं  के  लिए  जिंदगी को लाया था ।
इस  मुकद्दर  के सवरने  का  तू बहार ना बन ।।

मेरी    तन्हाइयों   को    मेरे   पास  रहने   दो ।
फिर उम्मीदों के लिए दिल का बेक़रार न बन  ।।

गुनाह    कर    गयी   कबूल    खामोशी   तेरी ।
सब गवाहों  के बदलने  का  तू सरकार ना बन ।।

मेरे खतों  से  पढ़ गयी  वो  मेरे  घर  का  पता ।
मेरे  रकीब  मइयतों   का   मदतगार  ना  बन ।।
                
                 नवीन मणि त्रिपाठी

दो कदम तू भी चली

---***ग़ज़ल***---

दो  कदम  मैं भी चला दो  कदम  तू भी चली ।
वक्त   मेरा   भी  ढला   उम्र   तेरी  भी  ढली ।।

सुनी थी  दूर  तलक  तेरे  घुंघरू  की  खनक ।
रात  भर  मैं  भी  जला रात भर तू भी जली ।।

ये  ख्वाहिशें  न  मिटी   जिंदगी  यूँ  ही  लुटी ।
मैं  अमानत  में  पला तू  तिजारत  में  पली ।।

उस  ज़माने  का जहर दिखा गया  था असर ।
गया  था  मैं भी  छला  गयी थी तू भी  छली ।।

हम   इशारों   में  गए  तुम   नजाकत में गयीं ।
थोडा मैं भी न खुला थोड़ी तुम भी ना खुली ।।

मेरे गुलशन की महक  मेरे  ख्वाबो की चमक ।
जुबां  से  मैं  भी  टला  वफ़ा  से  तू भी टली ।।

                   नवीन मणि त्रिपाठी

अरुणा शानबाग को श्रद्धांजलि

अरुणा  शानबाग को श्रद्धांजलि

     ---****गीत****---

अरुणा    तुम  व्यथित  कहानी  हो ।
आँखों    से   बहता   पानी     हो ।।


मानव     सेवा   का   ब्रत    लेकर ।
उत्साहों   को   नव   मुखरित  कर।
पावन     संकल्पो     पर  चलकर ।
फिर कदम  बढे  जीवन  पथ  पर ।
उन    विश्वासो   के   आँचल   पर ।
नारी      मर्यादा     में   रह   कर ।।

इस    नृशंस   क्रूर    मानवता  की ,
तुम   मौन  साक्ष्य   की  बानी  हो ।।
अरुणा  तुम व्यथित  कहानी   हो।
आँखों    से    बहता   पानी   हो ।।

जब   काल   क्रूरता  लिए  नियत ।
कर   गया    तार    तार   इज्जत ।
वह   जंजीरो   को   जकड   गया।
स्वासों   का  चलना  उखड   गया।
वह  नर   पिसाच   आचरण  लिए।
प्राणों   की   हिंसा   वरण   किये ।।

 तुम   संस्कृति   के   पाखण्डों  को 
ज्वाला     बनकर   पहचानी   हो ।।
अरुणा  तुम  व्यथित  कहानी  हो ।
आँखों    से    बहता   पानी    हो ।।

वर्षों     तक    मृत्यु     वेदना   से ।
लड़ती    तुम    पूर्ण    चेतना   से ।
पीड़ा    की    ज्वालामुखी   फटी।
अवचेतन   में    यह    उम्र   कटी ।
निर्दोष    प्राण   का   बलि   होना ।
अपराध      मात्र     नारी    होना ।।

जो सुलग  सुलग कर  रोज   जली
वह    समिधा   बड़ी   पुरानी  हो ।।
अरुणा  तुम  व्यथित   कहानी  हो ।
आँखों    से   बहता    पानी   हो ।।

बस   सात   वर्ष   की    कैद   उसे ।
 इतना     ही   न्याय  तेरे    हिस्से ।।
सब   छोड़   गए    तुझको  अपने ।
यह    दर्द     सहा     कैसे     तुमने।
है   मुल्क    यहां    मुजरिम    तेरा।
तेरे     कातिल    से    मुह     फेरा ।

इस     संविधान   के    पन्नों    पर  
कालिख   से   पुती   निशानी   हो ।
अरुणा   तुम  व्यथित कहानी   हो।
आँखों    से    बहता    पानी   हो ।।

           -नवीन मणि त्रिपाठीटी

ग़ज़ल

-----***ग़ज़ल ***----

रफ्ता  रफ्ता  जिंदगी   की  आरजू   जाती  रही ।
दरमियाँ  तन्हाइयों  के  मौत  कुछ   गाती  रही ।।

मत   कहो   वो   बेवफा  थी  आसनाई   में   मिरे।
वो   खयालो  में  मेरे   यूँ  रात  भर  आती   रही।।

बारिशें मुमकिन  कहाँ  जो भीग जाते  हम  कभी ।
बनके  सावन  की  घटा  ता  उम्र  वो  छाती  रही ।।

रोज़ रुसवाई की  चर्चा  फ़िक्र का अपना शबाब।
मैं जलूँगी  ख़ाक होने  तक  कसम  खाती  रही ।।

फिर  समंदर  ने गुजारिश  की है लहरो  से  यहां।
साहिलों  की  तश्नगी  पर जुल्म क्यों ढाती रही ।।

माँ  यतीमों  की  तरह  मजबूर  हो  करती  बसर।
जो  दुआएं   मांग   कर  मेरे   लिए   लाती  रही ।।

जिसकी आँखों  में शरारत  वो  थी  महबूबा  मेरी ।
पर  जो नज़र खामोश थी  बीबी वही भाती रही  ।।

                           --नवीन मणि त्रिपाठी

शनिवार, 9 मई 2015

जनाब मत पूछो

----***ग़ज़ल***---

उसका चेहरा है क्यूँ उतरा जनाब  मत पूछो।
लगा  है  हुश्न  पर  पहरा  जनाब  मत पूछो ।।

मुद्दई  और   गवाहों   की   जरुरत  क्या  थी ।
फिर  वो पेशी  से है मुकरा  जनाब मत पूछो।।

हम इंकलाब ए  मुहब्बत  की  खबर  लाये थे।
हो  गया  मुल्क  का  सहरा जनाब  मत पूछो ।।

इस  रियासत की ईट में  है फना की फितरत।
कैसे  झंडा  यहां  फहरा  जनाब  मत  पूछो ।।

हूर  ए  चिलमन  के उठाने  से  कहर बरपा  है।
जमी  से  चाँद  है  गुजरा   जनाब  मत  पूछो ।।

आलिमो  ने  यहाँ  दरियाफ्त  गुफ्त  गूँ  कर ली।
खतो  के  दर्द   का  मिसरा   जनाब   मत  पूछो।।

मुद्दतों  बाद  आशियाँ भी मिल  गया  दिल  में ।
रास्ता  क्यूँ   हुआ   सकरा  जनाब  मत  पूछो।।

सियाह शब्  में  इन्तजार  ए जख्म का मंजर।
फिर   मुकम्मल  यहाँ  ठहरा  जनाब मत पूछो ।।

सिलवटें  फिर  शिनाख्त  कर गयीं  बेचैनी की।
क्यों  गिरा  जुल्फ  से गजरा जनाब मत पूछो।।

           -नवीन मणि त्रिपाठी

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

                 प्रायश्चित  
                                                          -नवीन मणि त्रिपाठी 

      उन दिनों जमशेद पुर में फैक्ट्री में फोर्जिंग प्लांट पर मेरी ड्यूटी थी  फोर्जिंग  प्लांट अत्यंत व्यस्त हो चुके थे। मार्च के महीने में टार्गेट पूरा करने प्रेशर जोरो पर था । बिजली के हलके फुल्के फाल्ट को नजर अंदाज इसलिए कर दिया जाता था क्यों कि सिट डाउन लेने का मतलब था उत्पादन कार्य को बाधित करना जिसे बास कभी भी बर्दास्त नहीं कर सकते थे । फिर कौन जाए बिल्ली के गले में घण्टी बाँधने । जैसा चल रहा है चलने दो बाद में देखा जायेगा । सेक्शन में लाइटिंग की सप्लाई की केबल्स को बन्दरों ने उछल कूद करके अस्त व्यस्त कर रखा था । कई जगह से केबल्स के इंसुलेशन भी उधड़ चुके थे । ये केबल्स सेक्शन के एक पिलर से होकर जाती थीं । वहीँ एक एंगल के किनारे गिलहरियों ने अपना घोसला बना रखा था । सेक्शन में एक ओवर हेड क्रेन भी चलती थी  । क्रेन चलाने के लिए तीन फेज सप्लाई की जरुरत होती थी यह सप्लाई नंगे ओवर हेड तारों से ली जाती थी तारों पर कोई इन्शूलेशन नहीं होता  क्यों कि इन्ही तारों पर क्रेन की सप्लाई के टर्मिनल में लगे रोलर  घूम कर चलते थे । इन्ही तारों की वजह से कई बार बन्दरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। एक बार तो एक बन्दर के बच्चे ने गलती से तार को छू लिया और चिपक गया था फिर उसकी माँ  उसे बचाने की कोशिस में चिपक गयी और बाकी दो और भी चिपक गये थे जो शायद उनकी सहायता में पहुचे थे । इस तरह चार बन्दरों की मौत एक साथ होना एक दुःखद हादसा था  । उनके चिपकने से एक फेज का फ्यूज उड़ गया था । अतः लाइन काट कर उन्हें उतारा गया था उसके बाद फिर सप्लाई चालू कर दी गयी थी । इन मशीनों के बीच में रहते रहते हम भी कितने मशीन बन चुके थे इस बात का आकलन तब हुआ था जब बॉस के चेहरे पर बन्दरों की मौत के बजाय सप्लाई चालू होने की ख़ुशी देखी थी । सप्लाई चालू होते ही वे मुस्कुराते हुए ऑफिस में चले गए थे । संवेदनाये इतनी निष्ठुर भी हो सकती हैं ये बात सोचते सोचते मैं भी मशीनों के बीच काम में गुम हो गया था ।
      उस दिन कुछ महीनो बाद मेंटिनेंस के लिए मेरी सन्डे ड्यूटी लगाई गयी थी । सन्डे के दिन उत्पादन कार्य नहीं होता था सिर्फ प्लांट का मेंटिनेंस का कार्य होता था उस दिन बिजली की सप्लाई कांटेक्ट मोटरें और पैनल के अन्य पुर्जो की जाँच और मरम्मत का कार्य होता। दिए गए कार्य पूरे हो चुके थे । शाम 4 बजे तक कार्य पूरा हो चुका था । ऑफिस में इसी बीच मैकेनिकल ग्रुप के इंचार्ज कौसर अजीज भाई फुरसत के क्षणों में गप शप करने के वास्ते कमरे में दाखिल हो गए ।
  " अरे भाई तिरपाठी ! का हाल चाल  है यार " ।
" आओ कौसर भाई चाय आ रही है । अभी काम से फुरसत मिली है । और अपना सुनाओ ? "
मैंने कौसर भाई को बैठने का इशारा किया।
कौसर भाई बैठ तो गए लेकिन सामान्य से हट कर कुछ शांत थे और विचार मन्थन करते नजर आये ।
  " क्या हुआ भाई जान आज इतना शांत क्यों "।
" अरे यार चिंता हो गयी है "।
"किस बात की चिंता कौसर भाई? मैंने उत्सुकता बस उनसे पूछ लिया ।
   अरे ऊ पिलर पर गिलहरी जो घोसला लगाये है । उसके दो बच्चे हैं और कल ऊ बच्चवन की माँ बिजली वाले तारो में फंस गयी थी । "
" फिर क्या हुआ ?" मैंने पूछा ।
" फिर का भड्ड से हुआ । जइसे दग गयी हो । नीचे गिरी तो देखा जल के मर गयी ...... लेकिन ज्यादा बुरा ई हुआ उके लेदा  जइसन बच्चवन का का होगा ? वहीँ चिचियां रहे हैं कल से । मर तो जाएंगे ही ............
तिरपाठी यार कुछ सोचो उनके लिए .....।
    कौसर अजीज इतना कहते कहते कुछ गम्भीर हो गए ।
" ई के इंचार्ज तुम ही हो कितना पाप करोगे यार ? रोज बेचारे निर्दोष पशु पक्षी इसमें मरते हैं ......... तुम लोग गीदड़ होइ गए हौ ... बॉस के सामने मुँह से आवाज ही गायब हो जाती है । ये पाप झेलोगे भी तुमही लोग ।"
    कौसर भाई की बातों में दम था । वे मुस्लिम परिवार में पले बढे थे । बे मिशाल करुणा भाव के स्वामी थे । वह बहुत अच्छे गायक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्ति थे। कलाकार मन वाकई बहुत सरल होता है। उनकी यह धिक्कार मेरे अंतर्मन को झकझोर गयी थी और मैं अपने आप को अपराध बोध से नहीं बचा सका था। सहसा मेरे मानस पटल पर वह पुरानी बात किसी सिनेमा रील की तरह घूम गयी थी जब मेरी मोटर सायकल के नीचे एक गिलहरी दब कर मर गयी थी । मुझे उसके बारे में तरह तरह के ख्याल आये थे मैं काफी चिंतित हुआ था। गलती मेरी ही थी मोटर सायकल की स्पीड तेज थी और गिलहरी तेजी के साथ सड़क को पार करते समय पाहिये के नीचे आ गयी थी। जब यह दुर्घटना हुई तो मैं काफी दिनों तक मानसिक संत्रास झेलता रहा था । मुझे लगा था कि गिलहरी जब मरी थी तो वह मुह में दबाये हुए कुछ ले जा रही थी शायद बच्चों के लिए । वो बच्चे उसका इंतजार किये हुए होंगे ....फिर उन बच्चों का क्या हुआ होगा ......। ये सारी बातें आज भी मुझे व्यथित कर जाती थीं । बार बार सोचता था प्रभु मेरा यह पाप कैसे उतरेगा ।
     मन में विचार आने लगे शायद भगवान ने मुझे प्रायश्चित करने का अवसर दिया है । अचानक तन्द्रा टूटी और पत्नी का ख़याल आया । वह आधात्मिक विचारधारा से युक्त है जीवों के लिए दया भाव तो है पर उन्हें पलना पोषना वह पाप की परिधि में लाती हैं। उनका मनना है कि इस से जीवों की स्वच्छंदता प्रभावित होती है और मनुष्य में आसक्ति पनपती है । यह आसक्ति पाप की परिचायक है । वह जीवन भर कुत्ता बिल्ली तोता खरगोश आदि के पालने की विरोधी रही हैं  । मैं जनता था वह किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं करेंगी और मुझे इन बच्चों को वापस लाना ही पड़ेगा ।
     चाय आ चुकी थी कौसर भाई ध्यान मग्न होकर चाय की चुस्की ले रहे थे तभी उन्होंने फिर कहा -
"अरे भाई तिरपाठी ये देखो कुछ सुना ".........
"मैं कुछ समझ नहीं पाया भाई आपने क्या सुना ?  " मैंने कौसर भाई से पूछा ।
" ई उनही गिलहरी के बच्चवन की आवाज है। कितनी दूर तक ई आवाज पहुच रही है । आओ चलौ हमरे साथ हम दिखाते हैं ।"
    इतना कहते ही वह चल पड़े । वहां पहुँच कर वह पिलर पर चढ़ गए घोसले में से चार बच्चों को निकाला । दो भोजन पानी के आभाव में मर चुके थे दो जीवित बचे थे ।
"ई देखो तिरपाठी ई दोनों भी आज कल मा मरि जइहैं ।
   ऐसा करो इनका तुम घर लइ जाओ रुई से दूध ऊध पिलाइहौ तौ जी जइहैं । "
     बच्चे बेहद कोमल थे परंतु मुरझाये हुए थे । काफी क्षीण अवस्था में थे । अगर उन्हें उसी घोसले में फिर रख देते तो उनकी मृत्यु निश्चित थी । अतः मैंने फैसला कर ही लिया था कि कुछ भी हो इन्हें जिन्दा रखने की  कोशिस जरूर करूँगा । उन्हें टेबल पर रख कर देखा तो थोडा बहुत चल लेते थे । भूखे होने की वजह से बहुत कमजोर हो गए थे । कुछ देर तक हथेली पर रख कर ध्यान से देखता रहा । ड्यूटी ख़तम हो चुकी थी , ईश्वर का नाम लेकर उन्हें घर ले आया ।
     घर लाते ही पत्नी ने पूछा ये डिब्बे में क्या है ? मैंने एक साँस में गिलहरी के बच्चों की कहानी सुना डाली । पत्नी के चेहरे पर एक अजीबो गरीब आकृति उभर आयी । आवेशित होकर बोल पड़ी
"आखिर ये जो महाशय आपको रास्ता दिखाए हैं वो क्यों नहीं ले गए इन्हें अपने घर ? आप ही बेवकूफ मिले थे ये पाप कमवाने के लिए । ये छोटे छोटे बच्चे कैसे जिएंगे, मर जाएंगे । मैं तो इस पाप के किनारे नहीं जाउंगी । आप जानो आप का काम जाने ।"
   उनका यह उपदेश चल ही रहा था तब तक मेरे दोनो बच्चे भी आ गए । गिलहरी के बच्चों को देखकर वे काफी खुश और उत्साहित नजर आए ।
बड़े बेटे ने प्रतिवाद किया -
" तो क्या" क्या हुआ मम्मी ..... वैसे भी मर जाते  कोशिस करने में क्या जाता है । थोड़े बड़े हो जाएंगे तो छोड़ देंगे ।इनकी जान बच जायेगी तो सबको ख़ुशी होगी । "
   छोटा बेटा पुनीत भी समर्थन में उतर आया ।
"मम्मी आप मान भी जाओ बच्चों को मरने नहीं देंगे हम लोग । "
   "ठीक है जैसी मर्जी हो करो हम किनारे नहीं जाएंगे  । हमें नहीं कमाना है कोई पाप ।" पत्नी ने झुंझलाते हुए कहा ।
"आप चिंता मत करो हम सब लोग मिलकर पाल लेंगे ।"
विनीत ने उन्हें सांत्वना दिया ।
  एक कटोरी में विनीत गाय का दूध ले आया । बच्चों के मुह को कई बार दूध तक लाया गया । दूध में मुह भी डुबोया गया लेकिन वे बच्चे दूध पीना ही नहीं जानते थे । फिर कौसर भाई की बात याद आयी  । रुई की बाती दूध से भिगो कर उनके मुह पर रखोगे तो पिएंगे ।  बाती को दूध से भिगो कर जब बच्चों के मुह तक लाया गया तो वे बच्चे माँ का थन समझ बाती को चूसने लगे  । इस तरह उनके दूध पीने का श्री गणेश हो चुका था। उन्हें जब लगातार हर दो घण्टे तक पर दूध दिया गया तब वे दो तीन दिनों के बाद स्वस्थ नजर आने लगे । उनके जीवित रहने की उम्मीद भी जाग गयी । उन्हें स्वस्थ होते देख पत्नी भी काफी खुश दिखने लगीं ।
    एक सप्ताह बाद अब वे बिस्तर पर चलने फिरने लगे थे । बच्चों ने उनके लिए गत्ते के एक डिब्बे में रुई डालकर घोसला बना दिया था । गत्ते में पेन से कई छोटे छोटे छेद कर दिया था जिससे हवा आती जाती रहे । एक बिल्ली का भी कभी कभी घर में आना जाना होता था इस लिए उसको ध्यान में रखकर मजबूती को पहले ही परखा जा चुका था। कोई बिल्ली उसे खोल ना सके इसलिए गत्ते में एक लाक की भी व्यवस्था की गयी थी । उनका बिस्तर पर टहलना चीं चीं चिक चिक करना । फिर एक दूसरे को ढूढ़ना सब कुछ बहुत मनोरंजक हो गया । बच्चों की चंचलता उनका खेलना कूदना देख कर पत्नी मन्त्र मुग्ध हो जातीं थी । अब वह बच्चों की स्पेशल केअर टेकर बन चुकीं थीं । मोहल्ले के बच्चे भी उन्हें देखेने अपने पापा मम्मी को साथ में लेकर आने लगे   । मेरी फैक्ट्री के एक अधिकारी महोदय भी उन्हें देखने गए । बच्चों का दूध पीते वीडियो भी बनाया।
   एक दिन एक बच्चे का पेट फूल आया काफी सुस्त हो गया । किसी ने कहा सबको मत दिखाया करो । नज़र लग जाती है । बस तब से सावधानी बरती जाने लगी । हाजमा सही करने के लिए दूध को पतला कर दिया गया । दो दिन वह बच्चा स्वस्थ हो गया ।
    लगभग 15 दिन बीत चुके थे । वे बच्चे अब बिस्तर के बजाय फर्श पर टहलने लगे थे । उनके चाल में गति आ गयी थी चिक चिक चीं चीं की आवाज से अब पूरा घर गूँज उठता था । सुगमता से पकड़ में नहीं आते थे । आवाज देकर बुलाने पर वे करीब आ जाते और पैरो पर चढ़ जाते  फिर कन्धों तक पहुच जाते
फिर उतर कर भाग जाते । वे दूध अभी भी पीते थे । कभी बिस्तर पर आ जाते कभी तकिये के पीछे छिप जाते तो कभी परदे पर चढ़ जाते । बहुत ही मनोरंजक दृश्य उत्पन्न हो जाता था । पूरा परिवार अब टी वी के बजाय इनके खेल से आनंदित होने लगा था   । मेरे सामने चुनौतियाँ  बढ़ गयीं थी ।
अब इन्हें इनके मूल प्राकृतिक वातावरण की ट्रेनिग देनी थी । अब मैं इन्हें दरवाजे की फुलवारी में टहलाने लगा था । गुड़हल के पेड़ पर चढ़ जाना और उतर आना ये सब करतब ये सीख चुके थे । वहां अन्य गिलहरियां भी आती थी । चावल के कुछ दाने मैं जान बूझ कर वहाँ फेक देता था जिस से अन्य गिलहरियां वहां आकर रुके और बच्चों को अपनी कंपनी में शामिल कर लें   । और दूसरा उद्देश्य ये था कि बच्चे शायद देख कर अनाज के दाने खाने प्रारम्भ कर देंगे । गिलहरियां आने लगी थोडा बच्चों के करीब आतीं और फिर वापस चली जाती । इन बच्चों के प्रति उनके मन में कोई विशेष आकर्षण नहीं देखा गया  और ना ही दाना चुनते देख ये बच्चे उनसे प्रेरित ही हुए । यह क्रम भी एक सप्ताह तक चलता रहा ।
     रविवार के दिन मेरी छुट्टी थी । सवेरे बच्चों को बाहर निकाला । उनमे से एक बहुत सुस्त नजर आया । ध्यान से देखा तो उसे दस्त आ रहा था । घोसला बदला गया । दूसरे घोसले की डेटॉल से सफाई की गई । बच्चे की भी सफाई की गयी । मेडिकेटेड रुई घोसले में डाली गयी । बच्चे को मिनिरल वाटर दिया गया । उसने पानी काफी तेजी से पिया ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में पानी की काफी कमी हो गयी हो । थोड़ी सुस्ती कम हुई लेकिन समाप्त नहीं हुई । पानी मिला दूध भी दो बार दिया गया । थोड़ी सी चैतन्यता आयी। पता नहीं क्यों  जिस दूध को पीने के लिए वह प्रतिस्पर्धा रखता था आज वही दूध पीना उसे पसंद नहीं आ रहा था । दूसरे दिन सोमवार को वह बिलकुल सुस्त हो गया ।


             दस्त की समस्या अनियंत्रित होती जा रही थी । विकल्प के तौर पर मेरे पास ओ आर एस का घोल था हम उसे दे रहे थे । हर पांच मिनट पर एक दो बूँद घोल उसके मुह में डाल देते । कुछ पीता कुछ उगल देता । इसी बीच दूसरे बच्चे की हालत भी ख़राब हो गयी । वह कापने लगा थोड़ी देर बाद उसे भी वही समस्या तेज दस्त से उसकी भी स्थिति चिंता जनक होने लगी । पहले वाले बच्चे की स्थिति अब ज्यादा ख़राब हो गयी थी । पत्नी उसके लिए महा मृत्युंजय का जप कर रहीं थी । शाम सात बजे तक उसके हाथ पैर ऐठने लगे थे । अब बेहोशी की स्थिति में पहुच चुका था । दूसरा वाला भी काफी कमजोर हो गया था उसे मेट्रोजिल का सीरप भी  दिया गया । कोई सुधार नही हो पा रहा था ।
     घर पर पूरा परिवार दुखी था । क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था । दूसरे बच्चे के इलाज की भी वही प्रक्रिया चल रही थी। मेरी नाइट शिफ्ट ड्यूटी थी ड्यूटी जाना जरुरी था क्यों कि बाकी लोग छुट्टी पर थे । मैं ड्यूटी चला आया । रात भर उन बच्चों की चिंता मन में छाई रही । ईश्वर से प्रार्थना करता रहा। सवेरे पौने छः बजे छुट्टी होते ही घर पंहुचा तो देखा सब सो रहे थे । पत्नी ने बताया रात तीन बजे तक सब लोग उसके इलाज में लगे रहे एक तो लगभग बेहोश ही रहा दूसरा रात में तेज तेज कापने लगा था । विनीत उसका घोसला फ्रिज पर स्टेप लाइजर के पास रख आया था जिससे थोड़ी गरमी बनी रहे । मैं तुरंत फ्रिज के पास उनके घोसले तक गया । घोसला खोल कर देखा तो वे दोनों चेतना शून्य हो चुके थे । आँखे भर आईं । मैं पुनः अपराध बोध से ग्रसित हो गया । मेरी आत्मा ईश्वर से पूँछ रही थी हे ईश्वर अब इसका प्रायश्चित किस रूप में कराओगे ।
                                                 -नवीन मणि त्रिपाठी