इस मुफलिसी के दौर का, जबाब चाहिए।
जुर्मो सितम का अब हमें, हिसाब चाहिए॥
बे खौफ हो गया है यहाँ आम आदमी ।
शायद सियासतों में इंकलाब चाहिए ॥
इंसान मर रहा यहाँ रोटी के वास्ते ।
सरकार है उनकी उन्हें शराब चाहिए ॥
ईमान डर गया है ज़माने से इस कदर । जुर्मो सितम का अब हमें, हिसाब चाहिए॥
बे खौफ हो गया है यहाँ आम आदमी ।
शायद सियासतों में इंकलाब चाहिए ॥
इंसान मर रहा यहाँ रोटी के वास्ते ।
सरकार है उनकी उन्हें शराब चाहिए ॥
ईमानदार को भी अब नकाब चाहिए ॥
काँटों के बिस्तरों पे अब सोने लगे हैं लोग ।
नेता है, उसे बिस्तर ए गुलाब चाहिए ॥
हिन्दू या मुसलमा के खैर ख्वाह नहीं वो ।
उनको यहाँ अमन बहुत ख़राब चाहिए ॥
क्यूँ लोकपाल से उन्हे दहशत हुई है आज।
कहते हैं लोग, अब उन्हें जुलाब चाहिए॥
दंगो ने दी शिकस्त है इंसानियत को आज ।
कुर्सी का बेहतरीन , उसे ख्वाब चाहिए ॥
वह हुक्मरान है, उसे दावत कबूल है ।
उसको गरीब खाने से, कबाब चाहिए॥
हिन्दोस्ताँ कि लाज बचाने के लिए अब।
हर शख्स के सीने में, नयी आग चाहिए ॥