तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन
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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

ईमानदार को भी अब नकाब चाहिए

इस  मुफलिसी  के दौर का, जबाब चाहिए।
जुर्मो सितम का अब हमें, हिसाब चाहिए॥

बे  खौफ  हो  गया  है यहाँ  आम आदमी ।

शायद   सियासतों   में  इंकलाब  चाहिए ॥

इंसान   मर   रहा  यहाँ  रोटी   के  वास्ते ।
सरकार   है  उनकी   उन्हें  शराब  चाहिए ॥

 
ईमान  डर  गया  है  ज़माने से इस कदर ।
ईमानदार  को   भी  अब  नकाब  चाहिए ॥ 


काँटों के बिस्तरों पे अब सोने लगे हैं लोग ।
नेता  है,  उसे  बिस्तर  ए  गुलाब चाहिए ॥

हिन्दू  या  मुसलमा के खैर ख्वाह नहीं वो ।

उनको  यहाँ  अमन  बहुत  ख़राब  चाहिए ॥

क्यूँ  लोकपाल  से उन्हे दहशत हुई है आज।

कहते  हैं  लोग,  अब  उन्हें  जुलाब चाहिए॥

दंगो ने दी शिकस्त है  इंसानियत को आज ।
कुर्सी   का  बेहतरीन , उसे  ख्वाब  चाहिए ॥

वह  हुक्मरान  है,  उसे   दावत   कबूल  है ।
उसको   गरीब   खाने  से,  कबाब   चाहिए॥

हिन्दोस्ताँ   कि  लाज  बचाने  के लिए अब।
हर  शख्स  के  सीने  में, नयी आग चाहिए ॥
                              
           - नवीन मणि त्रिपाठी
             

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

नुक्ता चीं की भी सही तहजीब होनी चाहिए ।।

दिल की  जज्बातें बयां तरतीब होनी  चाहिए ।
नुक्ता चीं  की भी सही तहजीब  होनी चाहिए ।।

हर तरफ तो धुंध है ,छाया   हुआ  कुहरा घना ।
कातिलों की  बस्तियां  करीब   होनी चाहिए ।।

शायरों के शेर  को  करते हैं वो  अक्सर  फ़ना ।
बच  के  आये  शायरी,  नसीब   होनी  चाहिए ।।

क्यों सहादत माँगते हो उनके रुतबे की  भला ।
उनकी हिम्मते जमीर तो गरीब होनी चाहिए ।।

वह कहानी इश्क की, लिखता  रहा  वर्षों  से है ।  
ये   कहानी   भी   बड़ी , अजीब  होनी  चाहिए ।।

गर  मुहब्बत   है जरूरी, अपनी ही बेगम  भली ।
शर्त   ये   बेगम   मेरी,   हबीब   होनी   चाहिए ।। 

हर  कलम तारीफ लिखती जा रही  इस दौर में । 
वह   कलम   मेरे   लिए   रकीब   होनी  चाहिए।।

                                    नवीन  

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

तेरी आँखों में ......

तेरी आँखों में ......
                     


ग़ज़ल  की  तश्नगी  जरूर  तेरी  आँखों   में |
मीठे   एहसास  का  सरूर 
तेरी  आँखों  में ||

आइना  ने    अक्स , जब  तुझको  दिखाया |
बे  अदब  आ  गया , गुरूर   तेरी  आँखों  में ||


नज़र नज़र से मिली मुश्किलों के बाद मगर |
खास  तश्वीर   लगी   दूर    तेरी   आँखों    में ||

सुबूत दिल ने दिया दिल के सबब से तुमको |
है  बेवफाई   का    फितूर   तेरी    आँखों   में ||

जाम छलके भी हैं अक्सर यहाँ सलीके बिन |
मगर    है   कीमती   सहूर   तेरी   आँखों  में ||

तलाश   मंजिलों  के  आस  पास  से गुजरी |
मिली  वो  जन्नतों  की  हूर  तेरी आँखों में ||

जुल्फें हर वक्त क़यामत   का  जुल्म ढाती हैं |
लाल  डोरे  भी   हैं   मशहूर  तेरी   आँखों  में ||

दुआ मांगी थी जो मौला से मोहब्बत खातिर |
नफरतें   आयी   थीं   भरपूर  तेरी  आँखों  में ||

हार   कर  बैठ  गया  था  मैं  अधेरों  से  यहाँ |
पा  गया  जिंदगी  का   नूर  तेरी    आँखों  में ||

छुपा  छुपा  के  जतन लाख कर लिया तुमने |
बे   पर्दा   इश्क    है  हुजूर,  तेरी   आँखों   में ||

जब  भी  तनहा हुए, यादों के समंदर में गिरे |
अश्क  ढलने  लगे   मजबूर   तेरी  आँखों  में ||

हो  के  बेचैन  जब  मैं  तुझको  भूलना चाहा |
दिखा   है  मेरा   ही   कसूर   तेरी  आँखों  में ||

                          नवीन


बुधवार, 30 नवंबर 2011

मीत बन के कहानी बुनो तो सही

मीत बन  के  कहानी  बुनो   तो   सही |
तुम हृदय से हृदय  में  घुलो  तो  सही || 

स्वर जगा दूंगा होठों से सरगम  का मै|
बांसुरी बन के मुझको मिलो  तो  सही ||

पुष्प    राहों   में   तेरे   बिखर   जायेंगे |
दो  कदम   साथ   मेरे  चलो  तो  सही ||

तार   उलझे   हुए  जो   सुलझ  जायेंगे |
जिन्दगी  की  लिए  तुम ढलो तो सही ||

कब  तलक  बर्फ  बन  के जमोगे यहाँ ?
इस प्रणय अग्नि में कुछ गलो तो सही ||


जिन्दगी   के  अंधेरों  से  लड़  लूँगा  मैं |
एक  बाती  की  लव  बन जलो तो सही ||
                                                            -नवीन

तुझे मेरी वफाओं से ....

तुझे  मेरी  वफाओं  से  शिकायत  हो  गयी होगी |
बहुत रोका था नज़रों को हिमायत हो गयी होगी ||

इन  फिजाओं  में  भी,  महकी  है कोई  कस्तूरी |
किसी फतबे के  साए में हिदायत  दी गयी होगी ||


किसी पाजेब की घुघुरू की खनक रात भर आयी |
किसी की शाम  पे नज़रें इनायत  हो गयी होगी ||
   
चाँद   आया   था   तेरे   बज्म  में  शरमाया  सा |
बड़े  बेमोल  लम्हों  में  रियायत  हो  गयी होगी ||
                                                            - नवीन

छेड़ी जो ग़ज़ल

छेड़ी जो ग़ज़ल  रात  उसकी  याद  आ गयी |
पलकों में टिप टिपाती सी बरसात आ गयी ||

खुद को छिपा लिया  था  ज़माने इस  कदर |
परदे   हज़ार   फेंक  के   जज्बात  आ  गयी ||

मैंने  सुना  था  जख्म को भरता है वक्त भी |
हर वक्त  से  जख्मों  में नयी जान आ गयी ||

 गैरों   के  क़त्ल   होने  की  चर्चाएँ  आम  हैं |
अपनों के क़त्ल होने  की फरियाद आ गयी ||

उन  कांपते  होठों  ने जो  पूछा था मेरा हाल |
खामोसियाँ    लबों   पे   सरेआम  आ  गयी ||

अश्कों  ने  भिगोया  है  किसी कब्र की चादर |
नम  होती  हवाओं  से  ये  आवाज  आ गयी || 
                                                                       -नवीन

शनिवार, 26 नवंबर 2011

मैंने ग़ज़ल लिखी है

मैंने   ग़ज़ल   लिखी    है  तेरे    यादगार    की |
तश्वीर     पुरानी     है   ,  खिजांए   बहार    की ||

मौसम ने गुलिस्तां को भिगोया था बहुत खूब |
साजिस    रची   गयी   तेरे   पुरवा   बयार  की ||

दिल थाम के  रोया न  मैं आशिक मिजाज था |
अश्कों   ने   कहानी   लिखी  थी  तेरे प्यार की ||

लिक्खा   जो   नाम रेत  पे  पहचान की  खातिर|
लहरें    बहा   के  ले   गईं    अरमान   यार   की  ||

दिल    के  बाज़ार  में  तो  मैं  आया  था शान से |
कीमत   लगाई    तू    ने    मेरे   बे    करार   की ||
                                                                             -नवीन

बुधवार, 23 नवंबर 2011

दो गज़लें

                                           दो गज़लें 

                          - नवीन मणि त्रिपाठी 
                                     G1/28 अर्मापुर इस्टेट
                                         कानपुर-०९८३९६२६६८६

यहाँ सस्ता नहीं कुछ भी, यहाँ तो  नाम बिकता है |
तुम्हारे  जहाँ   का  ईमान , तो  बेदाम  बिकता  है || 

सिसकती माँ के आँचल से तड़प कर भूख से रोया |
मिला कर दूध में पानी, तो  सुबहो शाम बिकता है ||  

वो  लज्जा है ,हया  है ,शर्म  है ,आँखों  का  पानी है |
शहर में आबरू अस्मत भी  खुले आम  बिकता है ||
उसे बिकता हुआ देखा तो  अश्कों ने  भिगो डाला |
करूं क्या  एक  की चर्चा, यहाँ  आवाम बिकता है ||
बाप  मजबूर  था , बेटी  का दूल्हा  ला नहीं पाया |
मंडी  में  यहाँ  दूल्हा  भी   एक  दाम  बिकता  है ||

मौत   की   खातिर  शुकूं  ढूढ़ा   इसी  बाज़ार  में  |
 क्या  खबर  थी  अब  यहाँ  कोहराम  बिकता  है ||

वो  शातिर है  वो झूठा है जमाना  खूब वाकिफ है |
उसी   ताज  है  हासिल  यहाँ   ईनाम  बिकता  है ||

बेचने  वालों  ने  छोड़ा  नहीं  कुछ  भी  यहाँ  यारों  |
कहीं जीसस ,कहीं अल्ला कहीं पर राम बिकता है ||


                     २


वतन   की  आबरू  को  दागदार  मत करना |
चमन की खुशबुओं को शर्मशार मत करना ||

वो   परिंदा  है    कहीं  उसका    बसेरा   होगा |
इसी   दरख्त  पे  तुम  इंतजार  मत  करना ||

साजिशों  का  है  चलन  अब  तेरे मैखाने में |
किसी  पैमाने  का  तुम  ऐतबार मत करना ||

कभी मंदिर कभी मस्जिद से पुकारा तुमने |
वही  तो  एक  है   उसमें  दरार  मत  करना ||

ये  गोलियां  ये  धमाके  हैं  कायरों के करम|
बे  कसूरों  पे  कभी  दर्दे  वार   मत   करना ||

आज फिर भूख ने मांगी है जिन्दगी उसकी |
किसी की रोटियों  को  यूँ  फरार मत करना ||

भारती  माँ  है  रोज़  इसकी  इबादत  करना |
माँ  के आंशू  को  कभी नागवार मत करना || 

वतन की आबरू का ये तमाशा और कब तक है

बेटियों   को जलाने  का यहाँ  पर  दौर कब तक  है |
वतन  की  आबरू  का ये  तमाशा  और कब तक है ||

साजिसों  का चलन है देश को  बेचेंगे  वो इक दिन |
तुम्हारे   डूबते   ईमान  में  अब  जोर  कब  तक  है ||

रोया  है  यहाँ   जंगल  भी  जलते   आशियाने   पर |
भरोसा  कुछ नहीं अब तो यहाँ पर मोर कब तक है ||

 टूटती     साँस    में   नाब्जों   को    ढूढ़ते  क्यूँ   हो |
जिन्दगी बुलबुला है जिन्दगी की डोर कब तक है ||

 रात   गुजरेगी    भला   कैसे    इस    तन्हाई    में |
जिगर  ने  वक्त  से  पूछा बताओ भोर कब तक है ||
हर  तरफ  खौफ   है   बरबादियों   के   मंजर  का |
उड़ा क्र नीद शहरों की  छिपा ये चोर कब तक है ||

बादलों  से  भी  क्या  शिकवा  करूं  उम्मीदों  का |
सूखती आँख से बरसात ये घनघोर  कब  तक है ||

किसी आतंक  के  साये  में  बेचीं  जिन्दगी  उसने |
यहाँ कुनबों के कत्ले आम का ये शोर कब तक है ||

वतन को बेचने वालों वतन  को   खूब  बेचो  तुम |
सोच लेना  ज़माने  में  तुम्हारा  ठौर कब तक है ||
                                                                                -नवीन




 

रविवार, 13 नवंबर 2011

बदलते वक्त में मौसम की निशानी बन जा

बदलते वक्त में मौसम की निशानी बन जा .
महकते बज्म में फूलों की जवानी बन जा ..

मुखौटा ओढ़ के बैठा है फिर कोई शातिर .
बचपना छोड़ के थोड़ी सी सयानी बन जा ..

हम यहाँ दीप के बदले में दिल जलाते हैं.
स्याह सी रात में तू, भोर की लाली बन जा..

बड़े खामोश से लम्हों में कतल की आहट .
जिगर के कातिलों की आँख का पानी बन जा ..

एक मुद्दत से तेरा इंतजार करता हूँ .
मेरी किस्मत की तू इक शाम सुहानी बन जा ..

मैकदे में तो बहुत जाम है लेकिन साकी .
एक पैमाने भर शराब , पुरानी बन जा ..

महक उठी है एक शाम , तेरी खुशबू से .
फिजा के वास्ते तू रात की रानी बन जा ..


--- नवीन मणि त्रिपाठी

जी -१/२८ अर्मापुर कानपूर


फ़ोन न ० 09839626686
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मैंने ग़ज़ल लिखी है

 मैंने ग़ज़ल लिखी है , तेरे यादगार की |
तश्वीर पुरानी है , खिजां के बहार की ||

मौसम ने गुलिश्तां को भिगोया था बहुत खूब |
साजिश रची गयी तेरे पुरवा बयार की ||

दिल थम के वो रोया ना आशिक मिजाज था |
अश्कों ने कहानी लिखी थी तेरे प्यार की ||

लिखा जो नाम रेट पे पहचान की खातिर |
लहरें बहा के ले गयीँ , पानी के धार की ||

दिल के बाज़ार में तो मैं, आया था नाज़ से |
कीमत लगाई तूने मेरे बेक़रार की ||
                                                                                      -नवीन